शराब ने बिगाड़ी थी, नशा मुक्ति केन्द्र और एए ने मिलकर संवारी

- शराब की लत लेकर लौटा प्रोफशनल कोर्स करने गया छात्र, पांच साल की बरबादी के बाद बमुश्किल छूटी लत

By: praveen malviya

Published: 08 Apr 2020, 12:22 AM IST

भोपाल. एक मध्यमवर्गीय परिवार ने अपने इकलौते बेटे को करियर बनाने के लिए इंदौर भेजा लेकिन वहां से वह लेकर लौटा शराब की लत। कुछ दिन की लुका-छिपी के बाद जब पर्दा हटा तो पता चला कि घर का इकलौता चिराग बुरी तरह से नशे के दलदल में डूब चुका है। परिवार ने झाड़-फूंक से लेकर दवाईयां तक आजमाई लेकिन कुछ नहीं हुआ। आखिर जीवन के पांच कीमती साल बरबाद करने के बाद जिस दिन युवक ने खुद को बदलने की कसम खाई तब नशामुक्ति केन्द्र और फिर एल्कोहल एनॉनिमस के मिले-जुले प्रयास के साथ ताकत लगाकर वह नशे के दलदल से बाहर आ सका। मजे के रास्ते नशे में डूबने और फिर बमुश्किल निकलने की यह कहानी है शहर के ईश कुमार की। परिवार ने 2010 में ईश को एमबीए करने के लिए इंदौर भेजा था। ईश बताते हैं, पहले मैं कभी-कभार पीता था, लेकिन जब भी पीता मुझे पेट भर शराब चाहिए होती थी। जब तक मैं ब्लैकआउट में नहीं पहुंच जाऊं या मेरी आंखें बंद ना हो जाए। वहां मैं बेधडक़ शराब पीता था क्योंकि वहां मुझे रोकने औद देखने वाला कोई नहीं था। कोर्स के दौरान तीन सालों में मैं पक्का शराबी बन चुका था, लेकिन मैं यह मानता नहीं था। क्योंकि मैने शराब एंजॉयमेंट के लिए ही स्टार्ट की थी, क्योंकि मुझे शराब पीकर मस्ती करना अच्छा लगता था मुझे डीजे पर नाचने, घूमने में में मजा आता था। शराब ने शुरुआती समय में मुझे वह सब दिया जो मैं चाहता था, शराब पीने मेरी इच्छा बहुत तीव्र थी मैं पीने के लिए कहीं भी जा सकता था, कई बार पांच-पांच किलोमीटर चलकर दोस्तों के रुम तक भी गया। 2013 में एमबीए करके वापस आया तब तक मेरे घर वालों को कुछ पता नहीं था। मैंने भोपाल में भी शराब पीना जारी रखा मैं कभी-कभार शराब पीकर रात को लेट घर आता था तो घरवाले बदबू के बारे में पूछते थे, तो मैं बोलता था कि मैंने सुपारी खाई है, उसकी बदबू होगी। मेरी शराब की लत दिन प्रतिदिन बढ़ती चली गई मुझे अंदाजा ही नहीं रहा कि मुझे कब और किस वक्त कितनी शराब पीनी है। एक समय हालात ऐसे हो गए कि मैं सुबह उठते ही पहले शराब की दुकान जाने लगा, जो जरुरत शाम होते ही होती थी अब वह सुबह भी होने लगी। कई बार तो यह हुआ कि मैं शराब की दुकान खुलने से पहले ही वहां पहुंच जाता। कुछ समय बाद उठते ही मेरे हाथ पांव कांपने लगे थे, शरीर सिर्फ शराब मांगता था कि कोई मुझे शराब ला दे या मैं भाग कर जाऊं और शराब पी लूं। मेरी हालत ऐसी भी नहीं होती थी कि मैं दुकान तक जा सकू  ं, लेकिन मैं कैसे भी पहुंच जाता। अब कई बार में शराब पीकर शराब की दुकान, मैदान, सडक़ पर सो जाता, जब होश आता था तब पता चलता था कि मैं कहां पड़ा हूं । यह मेरे साथ रोज होने लगा, इस दौरान मेरी जेब से मोबाइल और पर्स चोरी होने लगे। जब मुझे हल्का-फुल्का होश रहता था तो मैं घर जाता था परिवार वालों के डर से मैं अपने ही घर की छत पर ही पड़ा रहता था। ट्रेन छूटना बैग चोरी होना रास्ता भटक जाना आम बात हो गई थी। मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं शराब इस कदर क्यों पी रहा हूं। मुझे शराब मैं मजा आना बंद हो चुका था, मैं बस बिना कारण पिए जा रहा था। परिवार वाले भी मुझसे परेशान हो चुके थे वे डॉक्टर बाबा झाड़-फूंक दवाइयां सब कर चुके थे, लेकिन मेरे जीवन में कोई बदलाव नहीं आया और आखिर हारकर उन्होंने मुझे श्री जीकेएस नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती करवा दिया क्योंकि मेरी शराब और में रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। नशा मुक्ति केंद्र से निकलने के बाद मुझे एल्कोहलिक एनोनिमस संस्था मिली वहां जाने से और बातें सुनने से और समझने से मुझे पता चला कि आखिर मेरे साथ क्या और क्यों हो रहा था, क्यों मैं इतनी शराब पी रहा था। इन सबने मिलकर मुझे दूसरा जीवन दिया है।

praveen malviya Reporting
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