ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता बताता है ये ड्रामा

ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता बताता है ये ड्रामा

hitesh sharma | Publish: Sep, 06 2018 05:13:15 PM (IST) Bhopal, Madhya Pradesh, India

शहीद भवन में नाटक 'चिमटे वाले बाबा' का मंचन

 

भोपाल। शहीद भवन में द रिफ्लेक्शन सोसायटी फॉर परफॉर्मिंग आट्र्स एण्ड कल्चर ने नाटक 'चिमटे वाले बाबा' का मंचन किया गया। 1967 में लिखे गए नाटक का पहला शो 11 नवंबर 1968 में जिनेवा में हुआ था। अंतिम शो 1990 में दिल्ली में फैसल अलकाजी ने किया था। करीब तीस साल बाद इस नाटक का मंचन किया गया। एक घंटे 45 मिनट के इस नाटक में ऑनस्टेज 8 कलाकारों ने अभिनय किया है। नाटक की कहानी बताती है कि इंसान जीवन में सच और शांति की तलाश में हमेशा भटकता रहता है, लेकिन वह हमेशा गलत रास्तों का ही चुनाव करता है। वह जहां पहुचंना चाहता है, वह मार्ग उसे जीवनभर दिखाई ही नहीं देता।

नाटक की कहानी बद्रीनाथ के रास्ते पर पहाड़ों के बीच एक ढ़ाबे की है। कहानी हरखू लाला और नत्थू के दृश्य से शुरू होती है। कहानी का हर पात्र सच की तलाश में है। नाटक का मुख्य मर्म भाव और दर्शन की गहराई है, अंतरात्मा से साक्षात्कार कर के जीवन का सारे अर्थ ही बदल जाते है,क्योंकि उसका यह वाक्य की जब सारे रास्ते बंद हो जाते है तभी मन का मार्ग खुलता है। मन के सारे बोझ हटा देता है, और आत्मा एवं परमात्मा के बीच की जीवात्मा को सारे रास्ते दिखा देता है।

 

मालती का जीवन की बंदिशों से आजाद होकर गौरैया बनने की इच्छा स्वाभाविक है और यही भाव मानचंद को चोट पहुंचा गया क्योंकि मानचंद के दर्शन के हिसाब से उसकी सोच उसके विचार ही सत्य है। वहीं, एक पात्र जयंत का अपने भूतकाल का बोझ ढोना उसे न तो वर्तमान का आनंद उठाने देता है और न ही भविष्य की सुनहरी धूप का दर्शन करने देता है। सभी एक चिमेट वाले बाबा की तलाश में हैं, जो वास्तव में है ही नहीं। नाटक के अंत में दर्शकों को दिए की लौ दिखाई देती है, जो धीरे-धीरे ऊपर की और बढ़ती हुई ओझल हो जाती है। नाटक का अंत दर्शकों के विवेक पर छोड़ दिया गया।

 

आइस गैस से कराया पहाड़ी क्षेत्र का आभास
नाटक के डायरेक्टर तनवीर अहमद का कहना है कि नाटक में दो दिन की कहानी दिखाई गई है। विभिन्न लाइट इफैक्ट के माध्यम से बिजली का कड़कना, मौसम का बदलना, चांद का निकलना जैसे दृश्यों को दिखाया गया है। नाटक में दो सीन रात में कलाकारों के आपसी संवाद के हैं, जो करीब 50 मिनट के हैं। पहाड़ी क्षेत्र में बादल जमीन पर उतरते से लगते हैं, इस इफेक्ट के लिए एसओटू गैस का यूज किया गया। इस गैस की खासियत होती है कि ये जमीन से डेढ़ से दो फीट ऊंचाई तक उठने के बाद खत्म हो जाती है। हालांकि ये काफी महंगी होने के कारण थिएटर में यूज नहीं की जाती। इसमें ड्राय आइस का यूज किया जाता है। इतने लंबे दृश्य के लिए करीब पांच किलोग्राम गैस उपयोग की गई। सेट पर पहाड़ों को दिखाने के लिए पेपर का यूज किया गया।

 

कबीर के भजनों से समझाया जीवन दर्शन
डायरेक्टर का कहना है कि ये नाटक काफी हद तक क्रिटिकल है, इसलिए इसे कम ही डायरेक्टर करना पसंद करते हैं। नाटक में जहां जीवन के रास्ते बंद हो जाते हैं, वहीं मन का रास्ता खुलता है... जब पानी कहीं ठहर जाता तो वह कहां जाता है... वहीं गहरे और गहरे धरती में, मन भी गहरे उतरकर अपना मार्ग पा जाता है... दुनिया में ऐसी कौन चीज है जिसे पाने से दुनिया को सुकून मिले... जैसे संवादों को दर्शकों ने काफी पसंद किया। नाटक में कबीर के दो भजन और दो गानों का प्रयोग किया गया।

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