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धारा 377 पर फैसले के बाद प्रेम के सातों रंगों को मिली लोकतंत्र के आसमान में जगह

अदालत के धारा 377 को रद्द करने पर लोगों की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं...

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lgbt file photo

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(पत्रिका ब्यूरो,भुवनेश्वर): समलैंगिकता को अपराध नहीं मानने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर महिला संगठनों ने सकारात्मक राय दी है। उनकी राय एलजीबीटी के पक्ष में है। अदालत के धारा 377 को रद्द करने पर लोगों की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। पढि़ए क्या कहती हैं ओडिशा की सामाजिक कार्यकर्ता।

समलैंगिकता कोई अपराध नहीं है

नम्रता चड्ढा (पूर्व सदस्य राज्य महिला आयोग) IMAGE CREDIT: पत्रिका ब्यूरो

मैं सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले का स्वागत करती हूं। समलैंगिकता कोई अपराध नहीं है। यह एलजीबीटी की आजादी है। यह निर्णय तो पहले ही हो जाना चाहिए था। अब एलजीबीटी की आजादी में कोई कानूनी अड़चन नहीं है। ये लोग इज्जत के साथ रह सकते हैं पर सोशल स्टेटस पाने की एक और लड़ाई इन्हें लड़नी होगी। जजमेंट पर वह कहती हैं, “दि रेनबो ऑफ इंडियन डेमोक्रेसी एंड कांस्टीट्यूशन शाइंस फाइनली।“

अन्य मनुष्यों की तरह समलैंगिकों का भी जीवन है

शुभाश्री दास (महिलाओं की माध्यम संस्था) IMAGE CREDIT: पत्रिका ब्यूरो

सुप्रीम कोर्ट का 377 पर जजमेंट स्वागत योग्य है। लोकतांत्रिक ढांचे में हरेक को यह अधिकार है कि वह पूरे सम्मान से जीवन व्यतीत करे। यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत मौलिक अधिकार की श्रेणी में आता है। अन्य मनुष्यों की तरह समलैंगिकों का भी जीवन है। शुभाश्री सवाल उठाती हैं कि यदि लिव इन रिलेशनशिप स्वीकार्य है तो थर्ड जेंडर क्यों नहीं? लोगों के माइंडसेट को बदलने की जरूरत है। ये अन्य लोगों से अलग हो सकते हैं पर प्रकृति ने उन्हें भी मानव जीवन की तरह जीने का अधिकार दिया है।

तहे दिल से फैसले का स्वागत

मीरा परीडा (संस्थापक, सखा) IMAGE CREDIT: पत्रिका ब्यूरो

इस फैसले से किन्नरों का सामाजिक सशक्तीकरण होगा। यह जजमेंट ऐसा आक्सीजन है जो हमें सम्मान भी दिलाएगा और जिंदगी जीने की वजह भी। हमारा देश भी दुनिया का पहला देश बन गया है जहां कि अदालत ने किन्नरों को सम्मान दिलाने के लिए सरकार को कल्याणकारी कार्यक्रम बनाने के लिए एक तरह से निर्देशित किया है। धन्यवाद देते हैं सुप्रीमकोर्ट को जिसने हमारे समुदाय के दर्द को महसूस किया। इस फैसले का पूरा किन्नर समाज तहे दिल से स्वागत करता है।

नैतिक मान्यता भी मिले

आरती देवी (सामाजिक कार्यकर्ता) IMAGE CREDIT: पत्रिका ब्यूरो


उच्चतम न्यायालय ने समलैंगिकता को कानूनी मान्यता दे दी है। पर सवाल यह है कि जब तक इसे नैतिक मान्यता नहीं मिलेगी, तब तक समलैंगिकों को नीची निगाह से देखा जाता रहेगा। उनके लिए यह एक त्रासदी हो सकती है। दूसरे शब्दों में कह लो तो सामाजिक ढांचे में रहते हुए सम्मान पाना। क्योंकि अब तक तो वह सार्वजनिक रूप से सामने ही नहीं आते थे। अब यहां से हमारे सहिष्णुता का नया अध्याय शुरू होगा।