नशे और अपराध की दुनिया से बच्चों को बचाने के लिए दें पर्याप्त समय, समझाइश और संस्कार

किशोर और युवाओं को नशे की लत से कैसे बचाएं, विषय पर आयोजित पत्रिका के टाक शो में शहर के विभिन्न क्षेत्रों से आए लोगों ने विचार व्यक्त किए।

By: Amil Shrivas

Published: 11 Nov 2017, 03:04 PM IST

बिलासपुर . किशोरों और युवाओं को नशे और अपराधिक प्रवृत्ति सें बचाने के लिए जरूरी है कि उनको बचपन से ही पर्याप्त समय, मार्गदर्शन और संस्कार दिए जाएं। बढ़ते बच्चों से लगातार बात की जाए ताकि वे अपने परिवार से हर बात शेयर करें और किसी गलत सलाह या संगत में न पड़ें। किशोर और युवाओं को नशे की लत और अपराध से कैसे बचाएं, विषय पर आयोजित पत्रिका के टाक शो में शहर के विभिन्न क्षेत्रों से आए एक्सपर्ट और प्रबुद्ध लोगों ने उक्त विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि अगर घर का कोई बच्चा किसी गलत संगत या बहकावे में आकर अगर नशे या अपराध की ओर बढ़े भी तो उसे पूरा परिवार सपोर्ट करें और जरूरत पडऩे पर उनकी काउंसिलिंग की जाए और मनोवैज्ञानिक और डाक्टरों के माध्यम से इलाज भी कराया जाए। घुमंतू बच्चों के लिए पुनर्वास केंद्र जरूरी है। नशे की लत के चलते चोरी, उठाईगीरी जैसे छोटे अपराध करते हुए बड़े अपराधों के जाल में आ जाते हैं।

बच्चों को समय और सीख देना जरूरी : पालक अपनी व्यस्तता से समय निकाल कर बच्चों को वक्त दें। उनको समस्या होने पर समाधान करें। असामाजिक तत्वों द्वारा बच्चों को नशा करा कर उनसे काम कराया जाता है। बच्चों में जवाबदेही और परिवार के प्रति प्रेम व इज्जत पैदा करना जरूरी है। शहर में गाँव के मुकाबले ज्यादा अपराध हो रहे हैं। गांवों में नैतिकता बची है। मीडिया, पुलिस प्रशासन और विभिन्न संस्थाओं को मिल कर काम करना होगा।
शैलेष शर्मा, सदस्य सचिव, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण
हर स्तर पर ध्यान दें : स्लम एरिया में नाबालिग भी नशे की गिरफ्त में हैं। वे नशे की धुन में चोरी व अन्य अपराधों में भी संलग्न हो जाते हैं। उनके पुनर्विस्थापन की जरूरत है। अन्य वर्गों को भी अपने बच्चों पर ध्यान देना चाहिए। पेरेंट्स मॉनिटरिंग करें कि उनका बच्चा कहां है और क्या कर रहा है।
नीरज चंद्राकर, एएसपी, सिटी

बच्चों को गाइड करें : परिवार में जो होता है, बच्चे उसे देख कर सीखते हैं। माता- पिता अपने बच्चों पर खास ध्यान दें। स्कूल में मोरल साइंस की पढाई हो तथा शिक्षक बच्चों पर नजर रखें। आजकल छोटे बचे तक व्हाट्सएप पर हैंं। मेडिकल दुकानों में जरूरत है कि बच्चों को ऐसी कोई भी वस्तु न दें जिससे नशा हो।
मेघा टेम्भुरकर, एडिशनल एसपी
कॉलेजों में काउंसिलिंग की व्यवस्था हो : कॉलेजों में काउंसलिंग कराई जाए ताकि युवाओं और किशोरों को अच्छे बुरे का ज्ञान हो। बच्चों में और पालकों में जागरुरकता फैलाई जाए। हमारे कॉलेज में एनएसएस अच्छा काम कर रही है।
संजय दुबे, चेयरमैन, सीएमडी कॉलेज

ज्यादा जिम्मेदारी : बच्चों को सही राह देने की जिम्मेदारी सर्वप्रथम परिवार की है। इसलिए परिवार को टूटने से और बांटने से रोकना होगा। अच्छी शिक्षा और खेल पर ध्यान दें।
रजनीश सिंह, अध्यक्ष, जिला भाजपा
संस्कार देना जरूरी : हमने अभी युथ संस्कार पैनल चालू किया है। इसके अंंतर्गत दृष्टिहीन लोगों को एग्जाम के लिए कापी लेखक प्रदान करते हैं। युवाओं में आज संतुष्टि नहीं है। उनमें संस्कार देने की जरूरत है।
अभय दुबे, अध्यक्ष, यूथ संस्कार फाउंडेशन
मां को बचपन से सिखाना होगा बच्चे को : नशे से बचाने के लिए माँ को अपने गोद से ही बच्चे को सिखाना होगा। उन्हें भले-बुरे का ज्ञान होने पर वे किसी के बहकावे में नहीं आएंगे और नशे व अपराध की दुनिया से बच सकेंगे। सभी अपनी जिम्मेदारी समझें और मिलजुलकर साझा प्रयास करें। पत्रिका ऐसे आयोजन लगातार जारी रखेगा।
ज्ञानेश उपाध्याय, राज्य संपादक, पत्रिका छत्तीसगढ़

बच्चों को सही राह और साथ की जरूरत : बच्चा एक खाली कंटेनर है। हम जो सिखाएंगे, वह सीखेगा। अमेरिका और चीन से पालन की विधि सीखें। आज के बच्चे जल्दी बड़े हो रहे हैं। उनके पालकों को बुला कर मीटिंग करने और काउंसलिंग की जरूरत है। पालक के साथ सामाजिक संस्थाओं को भी अपनी जवाबदारी समझनी होगी।
बरुण सखाजी, स्थानीय संपादक, पत्रिका, बिलासपुर
समय और भरोसा दें : बड़े घर के बच्चे पैसों के चलते बिगड़ते हैं और नशाकरते हैं। इसी लत के कारण कई बार वे अपराधों में भी लिप्त हो जाते हैं। मोबाइल भी इसका एक बड़ा कारण है। खेलकूद बंद हो चुके हैं। बच्चे टीवी और मोबाइल में व्यस्त हैं। कई बार इसकी निगेटिव चीजें बच्चों को नशे और अपराध की ओर प्रेरित करती हैं। इस पर भी ध्यान देना जरूरी है।
चंद्रशेखर बाजपेयी, अध्यक्ष, जिला अधिवक्ता संघ

काउंसिलिंग की व्यवस्था : हमारे शहर में बच्चों को नशे व अपराध की ओर जाने से रोकने के लिए समझाइश व काउंसिलिंग देने की व्यवस्था नहीं है। इसके लिए व्यवस्था बननी चाहिए। बच्चे ही देश का भविष्य हैं, इसलिए सरकार को इस दिशा में गंभीर होना होगा और हेल्प व काउंसिलिंग सेंटर अधिक से अधिक संख्या में खोलने होंगे।
सागर प्रसाद जांगड़े, केंद्र समन्वयक, चाइल्ड हेल्प लाइन।
अनुशासित किया जाए : गरीबों के साथ संपन्न घर के बच्चे भी नशा करते हैं। इसमें पेरेंट्स की गलती है। पेरेंट्स अपने बच्चें को अच्छे संस्कार और शिक्षा दें। इसके लिए संस्थाओं को भी काम करना होगा। लड़कियों के साथ साथ लड़कों पर भी बंधन और अनुशासन हो कि वे समय पर घर आएं और जाएं। परिवार से जुड़ाव से भी बच्चों को गलत राह में ले जाने से बचाता है।
राजेंद्र श्रीवास्तव, बिलासा वरिष्ठ नागरिक मंच।

संगति से बिगड़ते हैं : परिवार में अगर कोई बुराई है तो उसे देख कर भी बच्चे बिगड़ते हैं। संगति से भी बच्चे बिगड़ते हैं। आर्थिक स्थिति खराब होने पर नुकसानदेह वस्तुओं को नशे के तौर पर उपयोग करने से मानसिक दुर्बलता के कारण भी वे अपराध में लिप्त हो जाते हैं। हमें बच्चों में पाजिटीविटी जगानी होगी। मैडिटेशन और योग ? से इसमें मदद मिलेगी।
डा. आरती पांडेय, प्रोफेसर, एचओडी सिम्स
पालकों के बीच बिगड़े संबंधों का भी असर : तलाक और पति- पत्नी में मतभेद से भी बच्चे बिगड़ते हैं। छत्तीसगढ़ में परिवार टूटने का बड़ा कारण शराब है। सिंगल फैमिली में कई बार पेरेंट्स पैसा कमाने में लगे रहते हैं और बच्चा बिगड़ जाता है। ज्वाइंट फॅमिली में बच्चों को अपने बड़ों और संबंधियों का साथ मिलता है। इससे उनको संस्कार सीखने में मदद मिलती है।
उषा किरण बाजपेयी, अध्यक्ष, नारी शक्ति काउंसलर, फैमिली कोर्ट
संस्थाओं को मिलकर काम करना होगा : सस्थाओं की जिम्मेदारी है कि वे बच्चों के लिए काम करें। घुमंतू और बेसहारा बच्चों को नशे और अपराध की ओर जाने से रोकना जरूरी है। इसके लिए कार्ययोजना तैयार कर सबको अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
ज्योत्सना स्वर्णकार, अध्यक्ष, लायंस क्लब गोल्ड

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