इस नाम की लड़कियों का जीना हो गया था दुश्वार, कईयों ने बदले नाम, उस पर बन रही फिल्म

By: पवन राणा
| Published: 10 Jul 2020, 08:19 PM IST
इस नाम की लड़कियों का जीना हो गया था दुश्वार, कईयों ने बदले नाम, उस पर बन रही फिल्म
20 साल पहले इस नाम की लड़कियों का जीना दुश्वार हो गया, कईयों ने बदले नाम, उस पर बन रही फिल्म

एक जमाने में लोगों ने अपने बच्चों का नाम प्राण रखने से परहेज किया। इससे भी ज्यादा एलर्जी बीस साल पहले केरल में 'शकीला' नाम को लेकर रही। वहां इस नाम की युवतियों का जीना दुश्वार हो गया था। इनमें से कइयों को अपना नाम बदलना पड़ा।

-दिनेश ठाकुर

शेक्सपियर की अमर कृति 'रोमियो एंड जूलियट' ( Romeo and Juliet ) का संवाद है- 'नाम में क्या रखा है? गुलाब को किसी और नाम से पुकारा जाए तो उसकी खुशबू नहीं बदलती।' फिर भी कभी-कभी किसी खास नाम को लेकर लोग न सिर्फ बेरुखी दिखाते हैं, बल्कि अपने इर्द-गिर्द सुरक्षा कवच भी खड़ा कर लेते हैं- ताकि उस नाम का साया भी उन तक न पहुंचे। समाज में 'राम' नाम के कई लोग हैं, 'रावण' मिलना मुश्किल है। साठ के दशक में जब प्राण ( Actor Pran ) फिल्मों में खलनायक बनकर किस्म-किस्म की बदमाशियां करते थे। उस जमाने में लोगों ने अपने बच्चों का नाम प्राण रखने से परहेज किया। इससे भी ज्यादा एलर्जी बीस साल पहले केरल में 'शकीला' ( Shakeela Movie ) नाम को लेकर रही। वहां इस नाम की युवतियों का जीना दुश्वार हो गया था। इनमें से कइयों को अपना नाम बदलना पड़ा। वजह यह थी कि उन दिनों शकीला नाम की अभिनेत्री की मलयालम में बनी पोर्न फिल्में धड़ाधड़ सिनेमाघरों में पहुंच रही थीं। यहां समाज का दोहरा चरित्र भी उजागर हो रहा था। एक तरफ लोग ऐसी फिल्मों को हिट कर रहे थे तो दूसरी तरफ 'शकीला' नाम से बिदक भी रहे थे।

केरल के उस दौर के हवाले से मलयालम फिल्मकार सुगीश ने 'शकीला' नाम की शॉर्ट फिल्म बनाई है, जिसे हाल ही यूट्यूब पर जारी किया गया। इसमें शकीला नाम की युवती (सरयू मोहन) के दर्द को अभिव्यक्ति दी गई है। उसके नाम को लेकर भद्दे मजाक किए जाते हैं। नाम की वजह से 24 बार उसके रिश्ते की बात टूट चुकी है। परिजन चाहते हैं कि वह अपना नाम बदल ले, लेकिन वह इसके लिए तैयार नहीं होती। फिल्म समाज में किसी नाम को लेकर बनने वाली बेबुनियाद धारणाओं पर कड़े प्रहार करने के साथ इस तथ्य को गहराई से रेखांकित करती है कि जो बातें बहुसंख्यक लोगों को मजाक लगती हों, उनसे कुछ की जिंदगी में उथल-पुथल मच सकती है। सिर्फ 18 मिनट की यह फिल्म अपनी बात बड़ी सहजता से कह जाती है, जो कई फिल्में ढाई-तीन घंटे खर्च करने के बाद भी नहीं कह पातीं।

एक दूसरे फिल्मकार मलयालम अभिनेत्री शकीला पर इसी नाम से बायोपिक भी बना रहे हैं, जिसमें रिचा चड्ढा यह किरदार अदा कर रही हैं। शॉर्ट फिल्म के मुकाबले इस बायोपिक के इरादे कुछ और लगते हैं। यानी यहां मामला 'कुछ लोगों की कोशिश है, कुछ लोग बहल जाएं' वाला है।