लॉकडाउन में लॉक हुई सब्जियां, मवेशियों को खिलाना हुआ मजबूरी

लॉकडाउन ने प्रदेश में सर्वाधिक मुसीबत किसानों की बढ़ा दी। खेतों में खड़ी उपज कटवाने के लिए मजदूर नहीं मिल रहे, अब सब्जियों को मंडियों तक पहुंचाने के लिए लोडिंग वाहनों को इजाजत नहीं हो रही।

By: pankaj joshi

Updated: 29 Mar 2020, 10:21 PM IST

लॉकडाउन में लॉक हुई सब्जियां, मवेशियों को खिलाना हुआ मजबूरी
- मंडियों तक लाने के लिए नहीं मिल रहे वाहन, मजदूर भी गायब
बूंदी. लॉकडाउन ने प्रदेश में सर्वाधिक मुसीबत किसानों की बढ़ा दी। खेतों में खड़ी उपज कटवाने के लिए मजदूर नहीं मिल रहे, अब सब्जियों को मंडियों तक पहुंचाने के लिए लोडिंग वाहनों को इजाजत नहीं हो रही। ऐसे में किसान जाएं तो कहा? बूंदी जिले में इन दिनों टमाटर, भिंडी और पत्ता गोभी की बम्पर पैदावार होने के बाद भी किसान पाई-पाई को मोहताज हो गए। उपज को मंडियों में ले जाकर नहीं बेच पा रहे। अब मजबूरी में सब्जियों को मवेशियों को खिलाना शुरू कर दिया। यहां जानकार सूत्रों ने बताया कि सोशल डिस्टेंस और वाहनों को सेनेटाइजर के बाद ऐसे उपयोग के लिए स्वीकृति जारी करनी चाहिए।
गलियों में बिक रहा 20 से 25 रुपए किलो
बूंदी शहर की गलियों में टमाटर 20 से 25 रुपए किलो बिक रहा। जबकि खेतों पर खरीदार नहीं आ रहे। नमाना क्षेत्र के टमाटर उत्पादक किसानों की मानें तो अब मजदूर भी नहीं मिल रहे। जबकि टमाटर की फसल की तुड़ाई रोज जरूरी हो गई। ऐसे में कोई रास्ता नहीं सूझ रहा। टमाटर मंडियों तक पहुंचाने के लिए भी कोई वाहन नहीं मिल रहा।
बड़े शहरों में जा रहा था खीरा
बूंदी जिले में कई किसानों ने पोली हाउस लगा लिए, जिनमें पैदा हो रहा खीरा ककड़ी हर साल आस-पास के बड़े शहरों में जा रहा था। अब वाहन उपलब्ध नहीं होने से इन किसानों के सामने संकट खड़ा हो गया। पोली हाउस संचालक कृष्णकुमार पोद्दार ने बताया कि 4 रुपए किलो में भी खरीदार नहीं मिल रहे। जबकि बड़े शहरों में इसी खीरा के 10 रुपए मिल रहे थे।
टमाटरों को मंडियों तक पहुंचाने के लिए कोई वाहन नहीं मिल रहे। शहरों तक सब्जियों को पहुंचाने की प्रशासन के स्तर पर व्यवस्था बनी रहे तो भावों में तेजी नहीं आएगी। अभी टमाटर की बम्पर पैदावार शुरू हो गई।
हेमंत मालव, किसान, लोइचा
फूल गोभी का सीजन शुरू हो गया। इस बार पानी मिलने से उत्पादन भी अच्छा रहा, लेकिन लॉकडाउन में इसे शहरों तक ले जाने के लिए लोडिंग वाहन नहीं मिल रहे। ऐसे में उपज का खर्चा निकालना मुश्किल हो गया।
रामशंकर सैनी, किसान, बड़ानयागांव

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