बंधनों से बचना है तो संयम पथगामी बनें

देवों द्वारा नारकी के जीवों को उनके पापों को याद दिला-दिलाकर वेदनाएं (Punishment) दी जाती है। इस प्रकार कर्मों में चिंतन करें कि हमने ऐसी वेदनाएं नरक (Narak) में कितनी ही बार भोगी है तो साधक जीवन के कष्ट व्यक्ति (man) को सुख ही प्रतीत होते हैं।

चेन्नई. एएमकेएम में विराजित साध्वी कंचनकुंवर व साध्वी डॉ. सुप्रभा 'सुधाÓ के सान्निध्य में साध्वी डॉ.हेमप्रभा 'हिमांशुÓ ने भगवान महावीर की अंतिम देशना उत्तराध्ययन सूत्र का मूल वाचन कराया। उन्होंने कहा नरक की वेदनाएं तीन प्रकार की बताई गई है- क्षेत्र वेदना, परमधामी देवों द्वारा वेदना और नारकी के जीवों द्वारा वेदना। वहां का आयुष्य बीच में नहीं टूटता, जितना होता है उतना भोगना ही पड़ता है। अनन्त गरमी, क्षुधा, पिपासा, शीत, दाह, ज्वर, खाज आदि रोग होते हैं। देवों द्वारा नारकी के जीवों को उनके पापों को याद दिला-दिलाकर वेदनाएं दी जाती है। इस प्रकार कर्मों में चिंतन करें कि हमने ऐसी वेदनाएं नरक में कितनी ही बार भोगी है तो साधक जीवन के कष्ट व्यक्ति को सुख ही प्रतीत होते हैं।


आत्मा ही वैतरणी, कामधेनु और कल्पवृक्ष
उन्होंने कहा जो स्वयं का नाथ नहीं है वह किसी अन्य का नाथ बनने के योग्य नहीं होता। स्वयं की आत्मा का स्वामी छह काय जीव त्रस, स्थावर प्राणियों का रक्षक बनने से होता है। आत्मा ही वैतरणी, कामधेनु और कल्पवृक्ष है। सुखों और दुखों की कर्ता व भोक्ता, स्वयं का मित्र और शत्रु भी है। जो साधक संयम के अनुसार आचरण नहीं करता वह दीक्षा लेने के बाद भी अनाथ है।

पुच्छिशुणं सम्पुट साधना में भाग लेने वालों के लिए ड्रॉ निकाला
जीव जब तक पाप करेगा बंधनों में बंधता रहेगा। बंधनों से बचना है तो संयम पथगामी होना है। तीर्थंकर प्रभु ने समय-समय पर जगह-जगह पर साधुचर्या की चर्चा की है। धर्मसभा में उपस्थिति सभी जनों ने चिन्मयसागर को श्रद्धासुमन अर्पित किए। श्री मधुकर उमराव अर्चना चातुर्मास समिति द्वारा दो दिवसीय निशुल्क एक्यूपंक्चर चिकित्सा शिविर का शुभारंभ साध्वीवंृद के सान्निध्य में किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने स्वास्थ्य लाभ लिया। प्रात: पुच्छिशुणं सम्पुट साधना में भाग लेने वालों के लिए ड्रा निकाला गया।

Dhannalal Sharma
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