पसंद और नापसंद के चक्र से बाहर निकलें

उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा कैसे जीव पदार्थ का निर्माण करता है और पदार्थ जीव को अपना गुलाम बना लेता है।

By: Ashok Rajpurohit

Updated: 30 Nov 2018, 01:45 PM IST

चेन्नई. पुरुषवाक्कम स्थित एएमकेएम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा कैसे जीव पदार्थ का निर्माण करता है और पदार्थ जीव को अपना गुलाम बना लेता है। कैसे आदमी डिप्रेशन और निराशा में चला जाता है। अनादिकाल से ही जीव और पदार्थ का यह मेलजोल चलता आ रहा है। पदार्थ के प्रति जीव का आकर्षक और विकर्षण ही उसे मृत्यु के चक्र में उलझाकर रख देता है। आगम कहते हैं कि जीव पुद्गल को बनाता है और पुद्गल जीव को बनाते हैं।
कोई वस्तु मिल गई तो अन्तर में उसकी मांग बढ़ जाती है, मिलने के बाद उसे संचित करने की भावना होती है। नहीं मिली तो उसे झपटने की भावना होती है। इस प्रकार जीव मोह में चला जाता है और इन्द्रियों के वश में होकर मौत के मुंह में चला जाता है। व्यक्ति अपनी भावनाओं के लिए भी चोरी, झूठ और पाप करता है। परमामा कहते हैं कि किसी से गुस्सा आए और मौका न मिलता है तो उसका परिग्रह कर लेते हैं, इसी प्रकार लोभ, माया का हम जो स्टोर करते हैं, उसी की डिमांड बढ़ती जाती है। आदमी किसी पदार्थ में रस लेता है और उसी की भावनाओं में खो जाता है। घटना तो चली जाती है लेकिन घटना को स्टोर कर लेना ही भावों के लिए पाप कर्म है। यह मन का खेल ऐसे चलता रहता है। हमारे मन में वस्तु को लेकर पसंदगी या नापंसदगी का भाव न आए। हम जैसा सोचते हैं उसी की हमारे अन्तर में शुरुआत हो जाती है और वैसे ही अच्छा या बुरा परिणाम आता है। हमें अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए और अपनी आस्था पर अटल रहना चाहिए।
जिस प्रकार आनन्द श्रावक को वैमानिक देव धर्म से डिगाने का प्रयास करता है लेकिन वह उसकी भावनाएं नहीं बदलती है और वह धर्म पर अडिग रहता है और देव उसके सामने हारकर नतमस्तक होता है, उसे प्रणाम कर उपहार देकर जाता है। समस्याओं से कभी हार न मानें, अपनी भावनाएं न बदलें, कभी मन में नकारात्मक भाव न लाएं। कष्टों में पाप के उदय को दोष न देते हुए अपने शुभ कर्मों में जुट जाएं।

Ashok Rajpurohit
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