शासकीय फरमान की नाफरमानी, इन अधिकारियों पर नहीं किसी का नियंत्रण

आयुक्त ने सीएमएचओ तथा सिविल सर्जन के खिलाफ की कार्रवाई, जीएसटी, टीडीएस तथा वैट में गोलमाल का मामला

By: Dinesh Sahu

Published: 06 Jun 2019, 11:40 AM IST

 

छिंदवाड़ा. मध्यप्रदेश पब्लिक हेल्थ सर्विसेस कॉर्पोरेशन लिमिटेड को किए गए भुगतानों पर काटे गए वैट, जीएसटी तथा टीडीएस की राशि को निर्धारित समय सीमा बीत जाने के बावजूद शासकीय खातों में जमा नहीं कराया गया और न ही सप्लायरों को इस कटौती का प्रमाण-पत्र प्रदान किया गया। इस लापरवाही पर मप्र संचालनालय स्वास्थ्य सेवाएं के आयुक्त नीतेश व्यास ने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी तथा सिविल सर्जन को कारण बताओ नोटिस जारी किया था तथा 27 मई 2019 तक उपस्थित होकर उचित जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे।

 

इसके बावजूद चिकित्सा अधिकारियों ने तय समय सीमा बीतने के बावजूद जवाब दिया न ही आयुक्त के समक्ष उपस्थित हुए। इसे विभाग ने गंभीर लापरवाही मानते हुए उप संचालक (शिकायत) के डॉ. विनोद कुमार देशमुख ने दोबारा कारण बताओ नोटिस जारी फिर अंतिम अवसर प्रदान किया है तथा मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) तथा सिविल सर्जन दोनों को 17 जून की सुबह 10.30 तक आयुक्त के समक्ष उपस्थित होकर संतोषप्रद जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए है। साथ ही लापरवाही बरतने पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी भी दी है।


यह है मामला -

 

मप्र पब्लिक हेल्थ सर्विसेस कॉर्पोरेशन लिमि. द्वारा विभाग को की गई विभिन्न सप्लाई के देयकों से काटे गए वैट तथा जीएसटी-टीडीएस की राशि को शासकीय खाते में जमा करने तथा सप्लायरों को काटे गए टैक्स का प्रमाण-पत्र प्रदान करने के लिए संचालनालय से बार-बार पत्राचार करता रहा तथा लंबित प्रकरण को प्राथमिकता से पूरा करने के निर्देश दिए गए, लेकिन चिकित्सा अधिकारियों द्वारा विभागीय आदेशों के पालन में लापरवाही बरती गई। बताया जाता है कि वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश तथा शासकीय खाते में राशि जमा नहीं करना अनुचित एवं आपत्तिजनक श्रेणी में आता है।

 

दो सौ रुपए प्रतिदिन की पैनाल्टी -

 

जानकारी के अनुसार प्रत्येक माह में जीएसटी समेत अन्य कटौती की राशि को आगामी माह की दस तारीख तक जमा करना तथा जीएसटी रिटर्न फाइल करना अनिवार्य होता है। साथ ही विलम्ब होने की स्थिति में प्रतिदिन के हिसाब से 200 रुपए पेनाल्टी का प्रावधान है। इसमें लापरवाही बरतने पर आहरण-संवितरण (डीडीओ) अधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार माने जाते है। इसके लिए संबंधित विभाग के सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्रासीक्यूशन की कार्रवाई भी की जा सकती है।

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