11 फ़रवरी 2026,

बुधवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

राजस्थान के इस प्रसिद्ध किले में तापमान नियंत्रण को लेकर गजब की कारीगरी, भीषण गर्मी में भी मिलती है राहत

दुर्ग पर राजा-महाराजाओं के जमाने में बनी इमारतें और महल इतनी भीषण गर्मी में भी न केवल ठंडे रहते हैं। बल्कि मजबूत भी हैं। पुराने समय में मकानों के निर्माण में गजधर (काम करने वाता शिल्पकार-कारीगर) प्रकृति प्रदत्त सामग्री काम में लेते थे।

less than 1 minute read
Google source verification

दुर्ग पर राजा-महाराजाओं के जमाने में बनी इमारतें और महल इतनी भीषण गर्मी में भी न केवल ठंडे रहते हैं। बल्कि मजबूत भी हैं। पुराने समय में मकानों के निर्माण में गजधर (काम करने वाता शिल्पकार-कारीगर) प्रकृति प्रदत्त सामग्री काम में लेते थे। जो मजबूती देने के साथ पर्यावरण के अनुकूल भी होती थी। उस जमाने में पत्थर के साथ प्रमुख रूप से चूना, तालाब की मिट्टी, गोबर काम में लिया जाता था। इनके अलावा अन्य कोई निर्माण सामग्री काम में नहीं ली जाती थी। प्राकृतिक वस्तुओं से निर्मित महल आज भी मजबूती से खड़े हैं।

वर्तमान में नई तकनीक से बन रही इमारतों, मकानों की उम्र लंबी नहीं है। सीमेंट, स्टील व आरसीसी एक समय बाद मरम्मत मांगती है। काम में ली गई सामग्री बीमारियां भी पैदा कर रही हैं। वहीं, पुरानी तकनीक से बनी इमारतें स्वास्थ्य के लिए लाभदायक, पर्यावरण संरक्षण में भी मददगार होती थी। शहर में दुर्ग पर पुरानी तकनीक से बने महल आज भी मजबूती के साथ खड़े हैं। दुर्ग पर फत्ता महल, पद्मिनी महल, राणा रतनसिंह महल, कुंभा महल इसके उदाहरण हैं।

इस तरह होता था निर्माण कार्य


● छत बनाने में चूने के साथ देसी गुड़, गूगल, मैथी काम में ली जाती थी। मैथी गोंद का काम करती थी। वहीं, गूगल-गुड़ का पानी मजबूती देता था।
● बाहरी दीवार,आसार डेढ़ से दो फीट की होती थी, इससे सूर्य की किरणें अन्दर तक देरी से पहुंच पाती थी।
● चूना प्लास्टर, फर्श व छत तैयार करने में काम में लिया जाता था। वहीं, कम आय वाले लोग चूने की जगह मुरड़, मिट्टी,गोबर काम में लेते थे।

बड़ी खबरें

View All

चित्तौड़गढ़

राजस्थान न्यूज़

ट्रेंडिंग