क्रोधांध व्यक्ति का नशा मदिरा से भी अधिक

क्रोधांध व्यक्ति का नशा मदिरा से भी अधिक
क्रोधांध व्यक्ति का नशा मदिरा से भी अधिक

Dilip Sharma | Updated: 10 Oct 2019, 02:28:51 PM (IST) Coimbatore, Coimbatore, Tamil Nadu, India

आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि आंख होने पर भी जिसके विवेक रूपी चक्षु पर आवरण आ जाता है तब व्यक्ति क्रोध, काम व लोभ में अंधा हो जाता है। ये तीनों आत्मा के परम शत्रु हैं।

कोयम्बत्तूर. आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि आंख होने पर भी जिसके विवेक रूपी चक्षु पर आवरण आ जाता है तब व्यक्ति क्रोध, काम व लोभ में अंधा हो जाता है। ये तीनों आत्मा के परम शत्रु हैं। साधु पद की उपासना, आराधना से इन शत्रुओं पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
वे बुधवार को यहां राजस्थानी संघ भवन में बहुफणा पाश्र्वनाथ जैन ट्रस्ट की ओर से चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के तहत ओली तप आराधना पर धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि क्रोध में रहा व्यक्ति परिणाम पर विचार नहीं कर पाता। वह यह भी नहीं देख पाता कि क्रोधांध व्यक्ति का नशा शराब से भी अधिक होता है।
उन्होंने कहा कि क्रोध के बाद काम भी व्यक्ति की आत्मा का शत्रु है। व्यक्ति हमेश पांच इंद्रियों के सुख की तलाश में रहता है। काम के अधीन व्यक्ति भाई की हत्या तक करने से नहीं चूकता। लोभ में डूबा व्यक्ति देखते हुए भी अंधा हो जाता है। धन, वैभव, सत्ता, शक्ति संपत्ति, मान -सम्मान आदि की चाह में वह अन्य के सुख को भूलते हुए अपने सुख की चाह में अंधा हो जाता है।
इन पर विजय पाने का एकमात्र उपाय साधु पद की आराधना है। साधु पद का ध्यान श्याम वर्ण से करना चाहिए। इसका अर्थ काला नहीं वरन वैराग्य का वर्ण है। इस पर कोई दूसरा वर्ण नहीं चढ़ सकता। सहनशीलता, साधना और सहायता के विशिष्ट गुण के कारण संत भगवंत अष्ट कर्मों पर विजय पा स सकते हैं। बाह्य, कष्टों सहन कर आत्मिक एवं मानसिक प्रसन्नता के सर्वोच्च स्थान पर रहते हैं। धर्मरूपी कल्प वृक्ष में साधु जड़ स्थान पर माना जाता है। जो पचं परमेष्ठि पदों को पाने का द्वार है। २७ गुणों से युक्त साधु पद की आराधना से हमें साधु पद प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। इससे पूर्व पर्युषण पर्व के निमित्त अनुमोदनार्थ नौ दिवसीय परमात्म भक्ति महोत्सव का आयोजन किया गया।

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