किडनैप हुए लोगो ने बयां किया दर्द: आसान नहीं थे वो 44 घंटे, पल-पल लोकेशन बदलवाते थे नक्सली

इन लोगों ने अपने दहशत के पल के बारे में पत्रिका को बताया कि कैसे उन्होंने अपना समय काटा। उन्होंने बताया कि नक्सली हर थोड़ी देर में उनका लोकेशन बदल रहे थे। उन्हेेें पुलिस से मुठभेड़ का भी डर सता रहा था।

दंतेवाड़ा. दंतेवाड़ा कें पालनार-मुलेर सडक़ का सर्वे के लिए ककाड़ी गांव पहुंचे पीएमजीएसवाई के सब इंजीनियर अरुण मरावी, मनरेगा के तकनीकी सहायक मोहन बघेल और पेटी ठेकेदार मिन्टू राय को नक्सलियों ने सकुशल छोड़ दिया है। लेकिन नक्सलियों के साथ गुजारे इन 44 घंटों में लगातार उनके दिल मौत की दहशत मंडरा रही थी।

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इन लोगों ने अपने दहशत के पल के बारे में पत्रिका को बताया कि कैसे उन्होंने अपना समय काटा। उन्होंने बताया कि नक्सली हर थोड़ी देर में उनका लोकेशन बदल रहे थे। उन्हेेें पुलिस से मुठभेड़ का भी डर सता रहा था। उनकी निगरानी में हर वक्त 50 से अधिक नक्सली तैनात रहते थे।

तकनीकी सहायक मोहन बघेल ने बताया कैसे किया था अगवा

मैं अपने तीन साथियों के साथ एक गाड़ी में अरनपुर कैंप से ककाड़ी पहुंचा था। यहां बाइक खड़ी करने के बाद इंजीनियर ने कहा कि सरपंच से मिलकर सडक़ के सर्वे को लेकर बात करनी है। घर में सरपंच नहीं थे। उनके आने का इंतजार कर रहे थे। कुछ ही देर में दो लोग उनके पास आए और पूछताछ करने लगे। इसके बाद उसने हथियार मोबाइल और गाड़ी की चाबी ले ली। उसने कहा कि बड़े लीडर आएंगे उसके बाद ही उन्हें आगे जाने दिया जाएगा। इस तरह शाम हो गई। इसके बाद वह अपने साथ चलने को कहा।

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अगवा करने के बाद जंगल के बीच से हम तीनों को ककाड़ी गांव से करीब 10 किमी दूर लेकर गए। इसके बाद एक जगह उन्हें रोक दिया। देखते ही देखते यहां कैंप तैयार हो गया। रात काफी हो चुकी थी। इसलिए यहां कुछ लोग खाना बनाने लगे। करीब एक घंटे बाद जब खाना बना तो इनमें से एक ने आकर उन्हें खाना दिया।

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वे सभी किसी का इंतजार कर रहे थे। इस दौरान वे खाना खाने के बाद फिर से अपना लोकेशन बदलने लगे। उनकी तेजी देखकर दिल में डर घर कर गया था। ऐसा लग रहा था कि कहीं पुलिस से इनकी मुठभेड़ न हो जाए। कुछ ही देर बाद एक जगह रूक कर पास में रखे सामान से सोने की तैयारी करने लगे।

उन्हें भी सोने के लिए चादर और अन्य चीजें दी गईं। सुबह की पहली किरण से पहले ही सब उठे और फिर सामान लेकर आगे बढ़ गए। दिनभर में 5 से 6 बार लोकेशन चेंज हुई। इस बीच सुबह नाश्ते और दोपहर का खाना भी उन्होंने दिया। इसके बाद 4 बजे कुछ लोग पहुंचे और कुछ बातचीत के बाद जाने को कहा।

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इंजीनियर अरूण मरावी ने सुनाई अरनपुर तक पहुंचने की कहानी

शनिवार की शाम 5 बज रही थी। उनका एक साथी लेकर हमें आगे बढ़ा। हर थोड़ी दूर में वह आदमी बदल जा रहा था। ककाड़ी पहुंचे थे। नेटवर्क मिलते ही घर में बात हुई। सकुशल होने और रिहा होने की जानकारी दी। इसी बीच एक और आदमी वहां पहुंचा और हम तीनों को फिर अपने साथ चलने के लिए कहा।

करीब ढ़ाई घंटे तक चलने के बाद एक जगह रूकना हुआ। यहां उनके अन्य लोग भी पहुंचे। यहीं सोने का आदेश हुआ। यहां रात बिताई। सुबह यहां काफी लोग मौजूद थे। यहां एक माओवादी ने उनसे चेतावनी दी और कहा कि अगली बार यहां इस सडक़ के काम के लिए मत आना।

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नहीं तो श्यामगिरी घटना की तरह ही अंजाम होगा। इसके बाद उसने कहा कि गांव में स्वास्थ्य सेवा, स्कूल और छोटी छोटी सीसी सडक़ जैसे विकास कार्य के लिए काम करें। वे अड़चन पैदा नहीं करेंगे। इसके बाद कुछ दूर लेजाकर छोड़ दिया। उस गांव के खाट में बैठे ही थे की आपकी टीम यहां पहुंच गई।

Karunakant Chaubey
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