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मिट्टी को आकार देने वालों पर महंगाई की मार

Inflation hit those who shape the soil दीपक व मिट्टी के बर्तन बनाना अब नहीं रहा लाभ का सौदादीपोत्सव की तैयारियों में जुटे कुंभकार  

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मिट्टी को आकार देने वालों पर महंगाई की मार

लालसोट. कुम्हार पाड़ा में रोड पर सजी मिट्टी के बर्तन व अन्य सामान की दुकान।


दौसा/लालसोट. दीपावली का त्योहार नजदीक आने के साथ ही अब तैयारियां भी जोर पकडऩे लगी हैं। लोग घरों व दुकानों की साफ-सफाई में जुट गए हैं। दीपावली को देखते हुए शहर व ग्रामीण इलाकों में कुंभकार भी दीपक व मिट्टी के बर्तन बनाने में जुट गए हैं। शहर में बस स्टैण्ड के पास कुम्हार मोहल्ले बसे तीन दर्जन से अधिक परिवार के सदस्य इन दिनों दीपक व मिट्टी के अन्य बर्तन बनाने में जुटे हुए हंै। इस पुश्तैनी धंधे को जहां अब तक आधुनिकता की ही मार झेलनी पड़ रही थी, लेकिन इस बार कमरतोड़ महंगाई का असर उनके रोजगार पर भी साफ तौर पर दिखाई दे रहा है। कुंभकार कैलाश, रामनाथ, रामोतार, शोजीराम,मोहन, रामोतार, बबलू, राजेश , बद्री, जगदीश, रतन एवं दिनेश समेत कई जन दीपावली आते ही उनके परिवार के सदस्य दीपक, सराई, गुल्लक एवं मिट्टी के अन्य बर्तन बनाने में जुट गए हैं। दिवाली के मौके पर सभी लोग अपने घरों पर मिट्टी के दीपक तो जरूर जलाते हैं, लेकिन धीरे-धीरे लोग अब मोमबत्ती व इलेक्ट्रॉनिक बल्बों को ज्यादा पसंद कर रहे हैं तथा दीपक की जगह इनका उपयोग कर रहे हैं। इससे पुश्तैनी रोजगार पर असर भी पड़ रहा है। इस बार मिट्टी लाने के लिए उन्हे कड़ी मेहनत के साथ काफी खर्चा भी करना पड़ा है, इसके अलावा बर्तन पकाने के लिए उन्हें भारी मात्रा मेे लकडिय़ों की जरुरत होती है, अब लकडिय़ों के दाम भी बढ़ गए हैं। इससे उनके काम में अधिक लागत आना शुरू हो गई है, जबकि आधुनिकता के चलते वैसे ही लोगों का मिट्टी के दीपक व बर्तनों की ओर रुझान कम हो गया है।
महंगाई के चलते नहीं निकल पाती है मजदूरी
इस पुश्तैनी काम में जुटे परिवारों का कहना है कि इस महंगाई के दौर में अब उनकी मजदूरी भी नहीं पा निकल रही है। उन्होंने बताया कि चाक का पानी व मिट्टी औषधि का काम करती है। मिट्टी गढ़कर उसे आकार देने वालों पर शायद धन लक्ष्मी मेहरबान नहीं है। इसके चलते कई परिवार परंपरागत धंधे से विमुख होते जा रहे हैं। दीपावली पर मिट्टी का सामान तैयार करना उनके लिए सीजनेबल धंधा बनकर रह गया है। हालात यह है कि यदि वे दूसरा धंधा नहीं करेंगे तो दो जून की रोटी जुटा पाना कठिन हो जाएगा। कुम्हारों का कहना है कि दीपावली व गर्मी के सीजन में मिट्टी से निर्मित बर्तनों की मांग जरूर बढ़ जाती है, लेकिन बाद के दिनों में वे मजदूरी या अन्य काम धंधा करके ही रोजी-रोटी चलाते हैं।
कुंभकारों को सता रहा मिट्टी का अभाव
इस त्योहारी सीजन में चाक पर मिट्टी को आकृति देने वाले कुंभकार मिट्टी नहीं मिलने से निराश हैं। कुंभकारों का कहना है कि इस बार उन्हें करीब साठ से सत्तर किमी दूर जाकर चाकसू से उन्हें मिट्टी लानी पड़ी है, जबकि अब तक वे लालसोट के आस पास के गंावों में ही मिट्टी मिल जाती थी। मिट्टी की कमी इन्हें इस कदर खल रही है कि मिट्टी के बर्तन, दीपक, सराई व अन्य सामान बनाना मुश्किल हो रहा है। ऐसे में मिट्टी को आकृति देकर परिवार का लालन-पालन करने वाले कुंभकारों को त्योहार फीका नजर आ रहा है। लगता है भविष्य में मिट्टी के अभाव में इनकी कला गुम हो जाएगी। कुम्हार परिवारों का कहना है कि इस बार उन्हें कई किमी दूर जा कर मिट्टी लानी पड़ी है। यदि इसी तरह मिट्टी की किल्लत बढ़ती रही तो कैसे वे अपने पुश्तैनी धंधे को जिंदा रख सकेंगे।


अब इलेक्ट्रिक चाक से बनाते है बर्तन
समय के साथ कुंभकारों ने भी तकनीक का सहारा लेना शुरू कर दिया है, जो कि थोड़ा खर्चीला जरूर है, लेकिन उनके काम में थोड़ी गति भी आई है। लालसोट में इस पुश्तैनी धंधे से जुटे सभी परिवार जहां पहले हाथ से चाक घुमाकर बर्तन बनाते थे, लेकिन अब उन्हें खादी भंडार की ओर से इलेक्ट्रिक चाक मिलने लगे हैं, जिनका वे उपयोग भी कर रहे है। कुुंभकारों का कहना है कि ये इलेक्ट्रिक चाक बिजली की मोटर से चलते है, जिससे उनका बिजली का बिल बढ़ गया है और बिजली गुल होने पर कई बार उनका काम भी घंटों तक अधूरा ही पड़ा रहता है।