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जीवनशैली में बदलाव से राेका जा सकता है स्ट्रोक

जीवनशैली में थोड़ा बदलाव लाकर स्ट्रोक जैसी बीमारी को रोका जा सकता है और इसकी संभावना को कम किया जा सकता है

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जीवनशैली में बदलाव से राेका जा सकता है स्ट्रोक

जीवनशैली में थोड़ा बदलाव लाकर स्ट्रोक जैसी बीमारी को रोका जा सकता है और इसकी संभावना को कम किया जा सकता है। यह जानकारी विश्व स्ट्रोक दिवस पर आयोजित एक सम्मेलन में भारतीय स्ट्रोक एसोसिएशन के अध्यक्ष डॉ. विनीत सूरी ने दी।

अपोलो अस्पताल की तरफ से आयोजित इस सम्मेलन में जाने-माने न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सूरी ने मरीजों की देखभाल में परिजनों के महत्व पर रोशनी डाली। सम्मेलन में स्ट्रोक से उबर चुके लोगों मौजूद रहे।

अस्पताल की आेर से जारी बयान के अनुसार, डॉ. सूरी ने कहा, ''स्ट्रोक को रोका जा सकता है और जीवनशैली में छोटे-छोट बदलाव लाकर इसकी संभावना को कम किया जा सकता है। स्ट्रोक की रोकथाम के लिए नौ तरीके महत्वपूर्ण हैं- ब्लड प्रेशर यानी रक्तचाप पर नियन्त्रण रखना, मधुमेह पर नियन्त्रण, कॉलेस्ट्रॉल पर नियन्त्रण, सेहतमंद आहार का सेवन, शराब का सेवन न करना या सीमित मात्रा में ही करना और दिल की बीमारियों, खासतौर पर एट्रियल फाइब्रिलेशन से बचा कर रखना।'

स्ट्रोक के बढऩे मामलों पर डॉ. सूरी ने बताया, ''एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में हर दो सेकेंड में एक व्यक्ति स्ट्रोक का शिकार होता है और हर छह सेकेंड में एक व्यक्ति की मृत्यु स्ट्रोक के कारण हो जाती है। हर छह में से एक व्यक्ति जीवन में कभी न कभी स्ट्रोक का शिकार होता है। हर साल दुनिया भर में 1.7 करोड़ लोगों को स्ट्रोक होता है और इनमें से 50 लाख लोग मौत का शिकार हो जाते हैं।'

उन्होंने कहा, ''भारत जैसे निम्न एवं मध्यम आय वर्ग वाले देशों में स्ट्रोक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, इसका मुख्य कारण यही है कि बीमारी की रोकथाम के बारे में जागरूकता की कमी है। भारत में हर साल स्ट्रोक के 14 लाख नए मामले आते हैं। वहीं दूसरी ओर उच्च आयवर्ग वाले देशों में स्ट्रोक के मामलों की संख्या कम हो रही है। समय रहते मरीज को एमरजेन्सी में इलाज देकर बीमारी के जानलेवा प्रभाव से बचाया जा सकता है।'

डॉ. सूरी ने कहा, ''जानकारी नहीं होने के कारण लोगों को पता ही नहीं चलता कि वे स्ट्रोक का शिकार हो चुके हैं। मरीज को गोल्डन आवर (4.5 घंटे) के अंदर अस्पताल पहुंचाना बहुत जरूरी होता है। समय पर अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को समय पर थ्रोम्बोलाइटिक या 'क्लॉट बस्टर' दवाएं दे दी जाती हैं, जिससे ब्लॉक हो चुकी वैसल्स खुल जाती हैं और मरीज समय रहते ठीक हो सकता है।'

डॉ. सूरी ने कहा, ''बिना कारण अचानक चेहरे, बाजू, टांग (शरीर के एक साइड में) में कमजोरी या सुन्नपन महसूस होना, बोलने और समझने में परेशानी, चक्कर आना, अचानक तेज सिर दर्द। लोगों को इन लक्षणों के बारे में जागरूक होना चाहिए और अगर किसी व्यक्ति में ऐसे लक्षण दिखाई दें तो तुरंत उसे अस्पताल ले जाना चाहिए।