श्रीकृष्ण की कुंडली में इस जगह बैठे थे ग्रह, तभी 16 कलाओं के थे महारथी

श्रीकृष्ण की कुंडली में इस जगह बैठे थे ग्रह, तभी 16 कलाओं के थे महारथी

Soma Roy | Publish: Sep, 02 2018 11:09:37 AM (IST) दस का दम

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को वृष लग्न में हुआ था। वो 16 कलाओं के महारथी थे। उनके मनमोहक रूप को देख हर कोई मंत्र-मुग्ध हो जाता है। मगर क्या आपको पता है वो सारे कार्य में इतने दक्ष कैसे थे। दरअसल ये सब उनके ग्रहों की स्थिति पर आधारित है। तो कैसी थी उनकी जन्म कुंडली आइए जानते हैं।

1.श्रीकृष्ण की जन्म कुंडली के मुताबिक उनका लग्न स्वामी चंद्र ग्रह है। तभी वो चंद्रमा के समान आकर्षक व्यक्ति रखते हैं। वहीं चंद्रमा से शुक्र ग्रह केंद्र में और सूर्य चतुर्थ भाव में होने के साथ अपनी राशि में था। इसी के चलते कन्हैया 16 कलाओं के महारथी थे।

2.कान्हा की कुंडली में पांच ग्रह उच्च के तथा एक ग्रह स्वराशि का था। कुंडली में शुक्र ग्रह के चतुर्थ भाव में स्थित होने से उन्हें उच्च स्तर का वैभवपूर्ण जीवन मिला। जिसमें उन्हें अपने मित्रों का भरपूर साथ मिला। चंद्रमा की इसी खूबी के चलते वे पूरी दुनिया पर राज कर पाए।

3.कृष्ण-मुरारी की कुंडली में गजकेसरी योग भी था। इसी वजह से उनका जन्म राज परिवार में हुआ और उन्हें राजसी ठाट-बांट भोग करने को मिला। ग्रह नक्षत्रों के मुताबिक उनके जन्मांक में लग्न में उच्च का चंद्रमा था इसलिए ये किसी को भी अपनी ओर आकर्षित करके उसे अपने लिए भावुक बना सकते थे। उनके इसी गुण के चलते पूरा विश्व उन्हें अपना गुरु मानते हैं।

4.कृष्ण की कुंडली के मुताबिक तृतीय भाव में मंगल था। जिस पर शनि ग्रह की दृष्टि पड़ रही थी। इसी कारण उनका कोई भी सगा भाई-बहन जीवित नहीं रह सका। जबकि एकादशेश तृतीय भाव में स्थित होने के चलते श्रीकृष्ण अपने भाई-बहनों में सबसे छोटे थे।

5.वहीं उनके द्वितीयेश में बुध पंचम भाव में उच्च राशि की स्थिति था। इसी के कारण भगवान श्रीकृष्ण अत्यन्त बुद्धिमान एवं विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। वे कला प्रेमी थे। वे सौंदर्य के प्रति आकर्षित होते थे।

6.श्रीकृष्ण की कुंडली में शनि ग्रह का विशेष प्रभाव था। क्योंकि उनके भाग्येश और दशमेश में शनि ग्रह विद्यमान थे। उनके प्रभाव के चलते ही श्रीकृष्ण बहुत पराक्रमी थे और दुष्टों का संघार करते थे।

7.शनि के प्रभाव के चलते ही श्रीकृष्ण का मोहिनी त्रिभंगी मुद्रा के दर्शन हुए थे। इसके अलावा इनके छठे भाव में राहु ग्रह विद्यमान था। इसके चलते उन पर माखन चुराने का आरोप लगा था। मगर चंद्रमा के प्रभाव के चलते वो नटखट चोर बन गए थे।

8.श्रीकृष्ण के सातवें घर में मंगल भा इसलिए वो बहुत बहादुर थे। उन्हें किसी से डर नहीं लगता था। तभी तो वो असुरों से बाल्यकाल से ही भिड़ जाते थे। मंगल ग्रह के कारण श्रीकृष्ण को गुस्सा भी आता था। तभी वो मिनटों में ही शत्रुओं को धूल चटा देते थे।

9.उनके अष्टमेश भाव में बृहस्पति विराजमान था। चूंकि सप्तम भाव ध्यान का भाव होता है और अष्टम भाव समाधि का। इसलिए इन दोनों भावों के स्वामियों का दृष्टि संबंध होने से योग की पराकाष्ठा प्राप्त हुई थी। इसी के चलते कन्हैया की कुंडिलिनी जाग्रत थी। उनका सिक्स सेंस बहुत तेज था।

10.नंद लाला की कुंडली में पांच ग्रह उच्च स्थिति में थे। जबकि एक ग्रह अपनी राशि में था इसलिए भगवान श्रीकृष्ण को ख्याति मिली। उनकी लोेकप्रियता आज भी कायमत है। चंद्रमा लग्न में जन्में होने के कारण लोग उनसे बहुत प्रभावित रहते हैं।

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