नोटबंदी से असंगठित सेक्टर के ६००० क्लस्टर्स में जा रही हजारों जॉब

नोटबंदी से असंगठित सेक्टर के ६००० क्लस्टर्स में जा रही हजारों जॉब
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जॉब मार्केट पर नोटबंदी के गंभीर असर अब और साफ हो रहे हैं। सबसे अधिक प्रभावित असंगठित सेक्टर हुआ है, जो ८० फीसदी लोगों को जॉब देता है। कैश में अधिकांश काम होने से मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन, ट्रांसपोर्ट, रिटेल, स्मॉल ट्रेड-सर्विसेज और एग्रीकल्चर जैसे सेक्टर अब लाचार दिखने लगे हैं।

उमानाथ सिंह

नई दिल्ली. जॉब मार्केट पर नोटबंदी के गंभीर असर अब और साफ हो रहे हैं। सबसे अधिक प्रभावित असंगठित सेक्टर हुआ है, जो ८० फीसदी लोगों को जॉब देता है। कैश में अधिकांश काम होने से मैन्युफैक्चरिंग, कंस्ट्रक्शन, ट्रांसपोर्ट, रिटेल, स्मॉल ट्रेड-सर्विसेज और एग्रीकल्चर जैसे सेक्टर अब लाचार दिखने लगे हैं। इनसे जुड़े वर्कर्स को या तो निकाला जा रहा है, या फिर तात्कालिक छुट्टी की जा रही है। देरी से पैसे मिलने या कम मिलने से भी बड़ी संख्या में वर्कर्स अपने गांवों-कस्बों की ओर लौट रहे हैं। 

जॉब लॉस पर श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय से बैठक

जॉब लॉस पर श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय से हुई बैठक में शामिल जेएनयू के प्रोफेसर और रोजगार मामलों के एक्सपर्ट डॉ संतोष मेहरोत्रा ने पत्रिका को बताया कि भाजपा और आरएसएस से जुड़े श्रम संगठन भी खासा नाराज हैं। स्मॉल इंडस्ट्रीज से जुड़े आरएसएस के संगठन लघु उद्योग भारती के साथ भारतीय मजदूर संघ ने भी मंत्री से ग्रामीण और छोटे उद्योगों के ६००० से अधिक इंडस्ट्रियल क्लस्टर्स में नए नोट पहुंचाने का आग्रह किया है, ताकि वहां छंटनी रुके। डिमांड कम होने का असर अब संगठित सेक्टर पर भी दिखने लगा है। यहां भी कंपनियों ने उत्पादन कम दिया है और विस्तार योजनाएं ठंडे बस्ते में चली गई हैं, जिससे छंटनी शुरू हो गई है। 

श्रमिकों को मेहनताना नहीं दे पाने से मीलें और मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स बंद हो रही हैं। उदाहरण के लिए, यूपी के फिरोजाबाद की ९० फीसदी बैंगल फैक्टरियां ने शटर गिरा दिए हैं। लुधियाना की कपड़े निर्माण इकाइयां जहां बंद हो रही हैं। पश्चिम बंगाल के चाय बागान वर्कर्स जॉबलेस हो रहे हैं और गुजरात की ६० फीसदी डायमंड व सेरामिक्स इंडस्ट्री अपनी दुकानें समेत रही हैं।

आंकड़े करते हैं तस्दीक

गुड्स और सर्विसेज की डिमांड कम होने से अधिकांश कंपनियां प्रोडक्शन कम कर रही हैं। संगठित-असंगठित दोनों सेक्टर डिमांड और इन्वेस्टमेंट की कमी से पहले से बेहाल थे। अक्टूबर में औद्योगिक उत्पादन ग्रोथ पिछले साल की समान अवधि के ९.९ फीसदी की तुलना में १.९ फीसदी रह गई। ऐसा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के खराब प्रदर्शन और कैपिटल गुड्स के प्रोडक्शन में कमी के कारण हुआ। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का योगदान ७५ फीसदी से भी अधिक है। अक्टूबर में इसमें २.४ फीसदी का कॉन्ट्रेक्शन यानी सिकुडऩ हुआ। कैपिटल गुड्स में तो इस दौरान २५.९ फीसदी और माइनिंग सेक्टर में ३.१ फीसदी का कॉन्ट्रैक्शन दर्ज किया गया। हालांकि इन सबके बीच रिकवरी के संकेत मिल रहे थे। लेकिन नोटबंदी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। तभी तो नवंबर में सर्विस सेक्टर की पीएमआई अक्टूबर के ५४.५ से कम होकर ४६.७ और मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई ५४.४ से कम होकर ५२.३ हो गई। इससे जीडीपी ग्रोथ में १-२ फीसदी की कमी की आशंका है। मेहरोत्रा ने बताया कि न सिर्फ नौकरियां जा रही हैं, बल्कि विस्तार योजनाओं के खटाई में पडऩे से रोजगार के नए अवसरों पर तत्काल पूर्ण विराम लग गया है।

बड़े सेक्टर भी प्रभावित

आईटी, बीपीओ, ऑटो, ट्रांसपोर्ट, जेम्स एंड ज्वैलरी, हैंडलूम, टेक्सटाइल और लेदर जैसे बड़े सेक्टर में २०१५ में निगेटिव जॉब ग्रोथ हुई, यानी नौकरियां कम हुईं। नोटबंदी से २०१६ में उनके नतीजे और खराब होंगे। उदाहरण के लिए, सिर्फ टेक्सटाइल सेक्टर में लगभग ७० लाख डेली वेज वर्र्कर्स काम करते हैं। कैश में मेहनताना मिलने से इनकी स्थिति आसानी से समझी जा सकती है। यही हालत हैंडलूम, लेदर, कंस्ट्रक्शन, ऑटो आदि सेक्टर की है।

१.५ करोड़ लोग जुड़ते हैं जॉब मार्केट से हर साल

हर साल लगभग १.५ करोड़ नए लोग जॉब मार्केट में आते हैं। लेकिन नवीनतम सर्वे बताते हैं कि आर्थिक सुस्ती के कारण अगले साल काम कर रहे ४ लाख लोगों की जॉब जाएगी। तेज ग्रोथ वाले ई-कॉमर्स सेक्टर में दो लाख लोग बेरोजगार होने वाले हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर उच्च ग्रोथ रेट वाले वर्षों में जॉब की संख्या नहीं बढ़ी तो कम ग्रोथ वाले साल में स्थिति क्या होगी। तभी तो आरबीआई ने ग्रोथ अनुमान को ७.६ फीसदी से कम करके ७.१ कर दिया है। अन्य एजेंसियों से इसके और कम होने की संभावना जताई है। आरबीआई द्वारा रेपो रेट में कमी नहीं करने से साफ है कि महंगाई बढऩे का दबाव बना हुआ है।

४५ फीसदी जीडीपी असंगठित सेक्टर से आता है।
८० फीसदी रोजगार असंगठित सेक्टर में उपलब्ध हैं।

०१ करोड़ जॉब हर साल पैदा करने का था भाजपा का वादा
२.५ करोड़ जॉब २०२३ तक जाएंगी एग्रीकल्चर सेक्टर से

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