रुपया@72: रिकाॅर्ड निचले स्तर पर फिसला, मोदी सरकार के लिए बढ़ गर्इ ये चुनौती

रुपया@72: रिकाॅर्ड निचले स्तर पर फिसला, मोदी सरकार के लिए बढ़ गर्इ ये चुनौती

Ashutosh Verma | Publish: Sep, 06 2018 03:31:27 PM (IST) अर्थव्‍यवस्‍था

जून 2018 के बाद अब तक रुपये में 7 फीसदी तक की गिरावट देखने को मिला है। सभी एशियार्इ करेंसी की तुलना में बात करें तो रुपये में सबसे अधिक गिरावट देखने को मिल रही है।

नर्इ दिल्ली। दुनियाभर की करेंसी डाॅलर के खिलाफ घुटने टेकते हुए दिखार्इ दे रहे हैं। डाॅलर के मुकाबले भारतीय रुपए में भी गिरावट देखने को मिल रही है। आज (गुरुवार) भी डाॅलर के मुकाबले रुपए ने गिरावट का एक नया रिकाॅर्ड बनाया है। आज भारतीय रुपया 34 पैसे की गिरावट के साथ 72.09 के नए निचले स्तर पर फिसल चुका है जो रुपये का अब तक का सबसे निचला स्तर है। जून 2018 के बाद अब तक रुपये में 7 फीसदी तक की गिरावट देखने को मिला है। सभी एशियार्इ करेंसी की तुलना में बात करें तो रुपये में सबसे अधिक गिरावट देखने को मिल रही है। रुपये में इस भारी गिरावट से भारतीय बाजार पर खासा असर देखने को मिलेगा ।


महंगी होगी कच्चे तेल की खरीदारी
रुपए की गिरावट से भारत को जो सबसे बड़ा झटका लगेगा वो कच्चे तेल के बिल को लेकर होगा। पिछले पांच साल में कच्चे तेल के आैसत अायात की बात करें तो ये 5 फीसदी रहा है। इस हिसाब से 2018 कें अंत तक 3.6 फीसदी तक की बढ़ जाएगी। इसके साथ ही अब कच्चा तेल खरीदने के लिए भारत को पहले से अधिक रुपये खर्च करने होंगे। एेसे में घरेलू तेल विपणन कंपनियां भी पेट्रोलियम पदार्थों के दाम में इजाफा करेंगी। सबसे बड़ा असर डीजल के भाव में बढोतरी से देखने को मिलेगा।


महंगार्इ
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआर्इ) के अनुसार भारतीय रुपये में 5 फीसदी की गिरावट से महंगार्इ दर में करीब 20 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी देखने को मिलेगा। आरबीआर्इ की इसी गणित के हिसाब से देखें तो यदि इस साल के अंत तक रुपये में 14 फीसदी की गिरावट होती है तो महंगार्इ दर में 56 बेसिस प्वाइंट का इजाफा देखने को मिल।


बढ़ेंगी ब्याज दरें
अगर रुपये में लगातार गिरावट का दौर जारी रहा तो आरबीआर्इ को मजबूरन रेगुलेटरी ब्याज दर में भी बढ़ोतरी करना होगा। ब्याज दरों में बढ़ोतरी से खपत आैर खर्च पर नाकारात्मक असर देखने को मिलेगा। खपत आैर खर्च में भी गैप बढ़ता जाएगा। वित्त वर्ष 2014 में भी ब्याज दरों में लगातार तीन बार बढ़ोतरी के बाद निजी खपत एवं खर्च में 2 फीसदी का इजाफा हुआ था।

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