असम की इस जनजाति के लिए मुसीबत बन गया है, यह सरनेम

(Assam News ) लोगों की जातियों की पहचान (Assam's tribal facing surname problem ) उनके सरनेम से होती है। सरनेम से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कौन किस जाति या धर्म से संबंध रखता है। लेकिन यदि यही सरनेम सिरदर्द बन जाए (This surname is headache for tribal ) और एक बड़े समुदाय के सामने मुश्किलें भी खड़ा कर सकता है। असम की जनजाति एक सरनेम को भारतीय अपसंस्कृति के हिसाब से अपमानजनक शब्द मान लिया गया है।

By: Yogendra Yogi

Updated: 24 Jul 2020, 06:23 PM IST

गुवाहाटी(असम): (Assam News ) लोगों की जातियों की पहचान (Assam's tribal facing surname problem ) उनके सरनेम से होती है। सरनेम से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कौन किस जाति या धर्म से संबंध रखता है। लेकिन यदि यही सरनेम सिरदर्द बन जाए (This surname is headache for tribal ) और एक बड़े समुदाय के सामने मुश्किलें भी खड़ा कर सकता है। असम की जनजाति एक सरनेम को भारतीय अपसंस्कृति के हिसाब से अपमानजनक शब्द मान लिया गया है। इस जनजाति को इस सरनेम के कारण न केवल हंसी का पात्र बनना पड़ रहा है बल्कि समान अवसरों के अधिकारों से वंचित होना पड़ रहा है। जबकि यह सरनेम उन्हें उनके पूर्वजों से मिला है। नौबत यह आ गई है कि रोजगार-व्यवसाय की मजबूरी में इस जनजाति के लोग अपना प्राचीन गौर गौरवमयी सरनेम छिपाने या बदलने को मजूबर हो रहे हैं।

सॉफ्टवेयर ने आवेदन नहीं स्वीकारा
दरअसल असम की इस जनजाति के सरनेम का यह मामला इन दिनों सुर्खियों में है। गुवाहाटी के गोगामुख शहर की निवासी हैं और कृषि अर्थशास्त्र और फॉर्म मैनेजमेंट में मास्टर डिग्री हासिल कर चुकी प्रियंका ने केन्द्र सरकार की कम्पनी नेशनल सीड कॉर्पोरेशन लिमिटेड जो कि एक सरकारी कंपनी में नौकरी के लिए ऑनलाइन आवेदन करने की कोशिश की। प्रियंका ने कई बार एप्लीकेशन को फाइल करने की कोशिश की लेकिन सरनेम की वजह से संभव नहीं हो पाया क्योंकि सॉफ्टवेयर उस सर नेम को बार-बार रिजेक्ट कर दे रहा था। सरनेम होने की वजह से उनका एप्लीकेशन स्वीकार नहीं किया गया।

फेसबुक पर लिखी व्यथा
सॉफ्टवेयर बार-बार उनके सरनेम को गलत बता रहा था और सरनेम के स्थान पर स्लैग का उपयोग नहीं करने के लिए कह रहा था। कई बार कोशिश करने के बाद भी जब महिला का सरनेम स्वीकार नहीं हुआ तो उन्होंने फेसबुक पोस्ट के जरिए गुस्सा जाहिर किया। इसके बाद से सरनेम का यह मुदï्दा सुर्खियों में है।

20-25 लाख आबादी
प्रियंका जिस जनजाति से ताल्लुक रखती है, इसकी आबादी 20 से 25 लाख के बीच है। इस समुदाय के लोग 'चूतिया' सरनेम लगाते हैं। बस यही इनकी मुसीबत बन गया है। इस शब्द को सॉफ्टवेयर अपशब्द के तौर पर मानता है, इसलिए प्रियंका नौकरी के लिए ऑन लाइन आवेदन नहीं कर सकी। जितनी बार भी उसने प्रयास किया बार-बार यह मैसेज आता रहा कि यह स्लंग है।

ओबीसी में यह जनजाति
'चूतिया' समुदाय को भारत सरकार ओबीसी यानि अन्य पिछड़ा वर्ग में रखती है। मूलतौर पर असमी बोलने वाले माने जाते हैं। अब ज्यादातर इस समुदाय के लोग असम के ऊपरी और निचले जिलों के साथ बराक घाटी में रहते हैं। विकीपीडिया ने इस समुदाय के संबंध में एक लंबा-चौड़ा पेज भी बना रखा है। इस समुदाय का नाम सातवीं शताब्दी की शुरुआत में ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर निवास करने वाले अस्सम्भिना के नाम पर रखा गया है। उस काल में इस वंश के लोगों ने वर्तमान के भारतीय राज्यों असम और अरुणाचल प्रदेश में अपने साम्राज्य का गठन किया और वहां पर सन 1187 से सन 1673 तक राज किया।

पुस्तकों में उल्लेख
बिष्णुप्रसाद राभा, डब्ल्यूबी ब्राउन और पवन चंद्र सैकिया ने अपनी किताब द डिबोनगियास में लिखा है शब्द चू-ति-या मूलतौर पर देओरी 'चूतिया' भाषा से आया है, जिसका मतलब है कि शुद्ध पानी के करीब रहने वाले लोग। इसमें चू का अर्थ प्योर यानि शुद्ध या अच्छा, ति का मतलब पानी और या यानि उस भूमि में रहने वाले निवासी या लोग। आर एम नाथ ने अपनी किताब बैकग्राउंड ऑफ असमीज कल्चर में दावा किया है कि पहाड़ की चोटी (जिसे यहां की भाषा में चूट )से इस शब्द की उत्पत्ति हुई है। ऊपरी असम के मैदानी इलाकों में आने से पहले ये लोग पहाड़ों पर ही रहते थे। इस समुदाय के बहुत लोकगान हैं, जिसके जरिए वो कहते हैं कि वो भूमिक्काा औऱ सुबाहु चूतन के वंशज हैं।

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