हमारे संविधान का मूल ढांचा नहीं बदला जा सकता

संविधान देश की मूल विधि है। हमारे देश में जहां संविधान सर्वोपरी है वहीं इसे सामान्य विधायी प्रक्रिया द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता है..

ग्वालियर. संविधान देश की मूल विधि है। हमारे देश में जहां संविधान सर्वोपरी है वहीं इसे सामान्य विधायी प्रक्रिया द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता है। यदि विधान मण्डल द्वारा पारित कोई भी कानून संविधान के किसी उपबंध का अतिक्रमण करता है तो न्यायालय उसे शून्य घोषित कर सकता है।
राज्य अधिवक्ता परिषद द्वारा उच्च न्यायालय के केकेडी हॉल में आयोजित स्टडी सर्किल कार्यक्रम में अधिवक्ता दीपक खोत ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान स्वाभाविक प्रगति का परिणाम नहीं बल्कि देश में किए गए प्रयोगों का अभिलेख भी है। संविधान की रचना में भीमराव अंबेडकर ने कई देशों का अध्ययन इसे अमली जामा पहनाया। हमारे देश के संविधान में कई देशों के संविधान के उपबंध लिए गए। खोत ने मूलभूत अधिकारों, मूकर्तव्यों, वयस्क मताधिकार आदि बिंदुओं पर विस्तार से व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय के निर्णय के अनुसार संविधान में ऐसा कोई संशोधन किया ही नहीं जा सकता जिससे उसका मूल ढांचा ही बदल जाए। इस अवसर पर परिषद पदाधिकारी दीपेन्द्र कुशवाह, बीएम पटेल, एपीएस तोमर, शैलेन्द्र सिंह कुशवाह, कौशलेन्द्र सिंह तोमर, रविन्द्र सिंह कुशवाह आदि उपस्थित थे। आभार विवेक जैन ने किया।

रिज़वान खान
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