बेटे के न रहने पर दिव्यांग बच्चों की केयर करने का लिया दंपति ने फैसला

हिंदी नाटक 'रिश्ते नातेÓ का मंचन

By: Mahesh Gupta

Updated: 01 Mar 2020, 11:30 PM IST


ग्वालियर.
आर्टिस्ट्स कंबाइन ग्वालियर की ओर से हिंदी नाटक 'रिश्ते नातेÓ का मंचन दाल बाजार स्थित नाट्य मंदिर में रविवार को किया गया। लगभग डेढ़ घंटे के इस नाटक में कई मैसेज भी दिए गए। इस नाटक के निर्देशक प्रमोद पत्की और
मूल लेखक जयवंत दलवी रहे। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में एडीजी राजा बाबू सिंह एवं विशिष्ट अतिथि नितिन मांगलिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम को संबंधित करते हुए अतिथियों ने कहा कि मनोरंजन, सीख और हेल्दी माहौल देने का सबसे अच्छा माध्यम नाटक है।

ये है कहानी
नाटक की शुरुआत एक सामान्य परिवार से होती है, जिसमे माता-पिता और उनका एक बच्चा है। जिसका नाम इंबबीन है, जो मानसिक रूप से दिव्यांग है। पिता रात में ड्यूटी करते है और माता दिन में, जिससे बच्चे को संभालने में आसानी हो। नाटक की शुरुआत में मां ड्यूटी जाने के लिए तैयार है, लेकिन पिता अभी आए नही है । कुछ देर तैयार होते समय वो अपने बच्चे से बाते करती है। कुछ समय बाद पिता आ जाते हैं और मां बच्चे को नहलाने के लिए कहती है, लेकिन पिता मना कर देते हैं और आपस मे बहस कर बैठते है। उसके बाद मां नाराज होकर अपने काम पर चली जाती है। मां अपनी ड्यूटी पर देरी पहुंचती हैं, जहां उनके बॉस जिनका नाम पंडित था। पंडित को होम्योपैथी का दवाई देने का शोक था। पंडित अक्सर इंबबीन के लिए दवाई दे देते थे। इस प्रकार कहानी आगे बढ़ती है और विभिन्न घटनाक्रम जैसे पिता काटदरे का दोस्त वेंकटरमन का बेटा कृष्णा भी इसी तरह का होता है, जो जाने अनजाने में नींद की गोलियां खाकर मर जाता है। इस बात से कटदरे परिवार सकते में आ जाते हैं। एक दृश्य में मां शैलजा के जन्मदिन पर पंडित सर केक और गिफ्ट के रूप में साड़ी लाते है, जिसे देख इंबीन के भाव परिवर्तन होते है और वह उससे साड़ी खींचने लगता है। इस समय उसकी उम्र 16 साल की हो चुकी है। इस सदमे से शैलजा डर जाती है और पंडित सर को बताती है पंडित उनको दवाई देते है वो खाकर सो जाता है और सुबह मर जाता है। यह सदमा दोनों बर्दाश्त नहीं कर पात। अंतिम दृश्य में पंडित सर उनको नए सिरे से जीवन जीने के लिए प्रेरित करते है और दोनों निर्णय लेते है कि जो पैसा उन्होंने अपने बच्चे के लिए बचाया था, अब उस से ऐसे ही बच्चों को संभालने के उपयोग करेंगे और इसी सकारात्मक सोच के साथ ही नाटक यही समाप्त हो जाता है।

Mahesh Gupta
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