अयप्पा के दर्शन से पहले इस मस्जिद में जाते हैं सबरीमला मंदिर के तीर्थयात्री, जानें क्यों

केरल का सबरीमला मंदिर इन दिनों चर्चा में है। लोग इस मंदिर से जुड़ी हर छोटी और बड़ी बातें जानना चाहते हैं। ऐसे में हम आपको मंदिर के नियम और खास बातों से रूबरू करवा रहे हैं।

Vinay Saxena

October, 1803:34 PM

नई दिल्ली: केरल का सबरीमला मंदिर इन दिनों चर्चा में है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मंदिर को महिलाओं के लिए खोलने का आदेश दिया है। इसके बावजूद बुधवार को महिलाएं मंदिर तक नहीं पहुंच पाई। अब सबरीमाला संरक्षण समिति ने गुरुवार को 12 घंटे राज्यव्यापी बंद का ऐलान किया है। हालात ये हो गए हैं कि मंदिर की वजह से केरल का समाज दो हिस्सों में बंट गया है। लोग इस मंदिर से जुड़ी हर छोटी और बड़ी बातें जानना चाहते हैं। ऐसे में हम आपको मंदिर के नियम और खास बातों से रूबरू करवा रहे हैं।

हर साल तीन महीने के लिए खोला जाता है मंदिर

सबरीमला सबसे मुश्किल तीर्थ स्थानों में से एक है। यह मंदिर वार्षिक पूजा के लिए मध्य नवंबर से तीन महीने के लिए खोला जाता है। हर साल हज़ारों श्रद्धालु काली लुंगी पहनकर भगवान अयप्पा का नाम जपते हुए सबरीमला की यात्रा पर निकलते हैं। वहीं, हर महीने यहां पांच दिनों की मासिक पूजा भी होती है। वार्षिक पूजा के लिए मंदिर तक जाने की प्रक्रिया बेहद कठिन होती है। श्रद्धालुआें को संयत खान-पान का ध्यान रखना पड़ता है। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए पैदल चलना पड़ता है। 41 दिनों तक चलने वाले इस व्रत में वे कई नियमों का पालन करते हैं।

मंदिर से पहले इस मंस्जिद में जाते हैं श्रद्धालु, करते हैं पूजा-पाठ

बता दें, सबरीमला के रास्ते में एक छोटा सा कस्बा है। इस कस्बे का नाम है इरुमलै। यह कस्बा स्वामी अयप्पा के मंदिर से करीब 60 किलोमीटर पहले है। तीर्थयात्रा के दौरान श्रद्धालुआें का यहां रुकना एक नियम है। श्रद्धालु बहुत श्रद्धा के साथ एक सफेद भव्य मस्जिद में घुसते हैं। इसे वावर मस्जिद कहा जाता है। श्रद्धालु भगवान अयप्पा और 'वावरस्वामी' की जयकार करते हैं। वे मस्जिद की परिक्रमा करते हैं और वहां से विभूति और काली मिर्च का प्रसाद लेकर ही यात्रा में आगे बढ़ते हैं। अयप्पा मंदिर के तीर्थयात्री अपने रीति-रिवाज के अनुरूप पूजा-पाठ करते हैं, जबकि वहीं नमाज भी जारी रहती है।

500 साल पुरानी है मस्जिद की परिक्रमा करने की परंपरा


जानकारी के मुताबिक, मस्जिद की परिक्रमा करने की परंपरा पिछले 500 साल से भी अधिक समय से चल रही है। विशेष रूप से सजाए गए हाथी के साथ जुलूस पहले मस्जिद पहुंचता है। इसके बाद पास के दो हिंदू मंदिरों में जाता है। मस्जिद कमेटी हर साल सबरीमला मंदिर से अपने रिश्ते का उत्सव मनाती है, इस उत्सव को चंदनकुकुड़म यानि चंदन-कुमकुम कहा जाता है।

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Vinay Saxena
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