सुप्रीम कोर्ट के Triple Talaq पर फैसला आते ही शबाना ने कह दिया कुछ ऐसा, छा गया सन्नाटा

3 तलाक की क्रूरता पर चीफ जस्टिस को खून से खत लिखने वाली शबाना का कहना है कि मुझे अब उम्मीद की रोशनी नजर आ रही है...

देवास/इंदौर. तीन तलाक की विभीषिका झेल रही देवास की शबाना को इलाहाबाद हाल ही में आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला सुकून दे गया है। उन्होंने कहा कि यह मेरी ही नहीं पूरे समाज की महिलाओं की जीत है। किसी भी महिला के साथ तीन तलाक के नाम पर इस तरह से अत्याचार नहीं किया जा सकता।

3 तलाक की क्रूरता पर चीफ जस्टिस को खून से खत लिखने वाली शबाना का कहना है कि मुझे अब उम्मीद की रोशनी नजर आ रही है। शबाना का कहना है कि जब मैंने तीन तलाक का विरोध किया था तो समाज ने प्रश्न उठाए लेकिन मेरे परिवार ने मेरा साथ दिया। वो हर पल मेरे साथ खड़े रहे। अब उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के बाद यह दंश समाप्त हो जाएगा।

तलाक कानूनी होना चाहिए ना की मजहबी। हम 21वीं सदी में रह रहे हैं। हमें 21वीं सदी के हिसाब से ही सोचना चाहिए। मैंने पहले भी कहा था अब भी कहती हूं कि मैं पर्सनल लॉ को नहीं मानती। मुझे मेरे देश के कानून पर विश्वास है।

शबाना की कहानी बहुत ही दर्द भरी है। शबाना बताती हैं कि वह फिल्म नाम शबाना कि शबाना नहीं हैं और न ही कोई उनके दर्द को देखने आता है। वह सेलिब्रिटी नहीं हैं इसलिए किसी को उनके दर्द की भी इतनी फिक्र नहीं है। इसके बावजूद भी वे पूरे आत्मविश्वास से भरी हुई हैं और कहती हैं कि हां मेरा नाम शबाना है और मैं अपने हक की आवाज बुलंद करना चाहती हूं। तीन तलाक का दंश झेल रही एक लाचार मां भी हूं इसलिए इंसाफ के लिए मैंने अपने खून से खत लिखा है।

देशभर में तीन तलाक का मामला चरम पर है। इसी तलाक के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टीस को शबाना ने खून से दरख्वास्त लिखी थी। उसने कहा था कि न्यायालय मुझे न्याय दे अन्यथा मुझे इस घुट-घुट कर मरने वाली जिंदगी नहीं जीना आत्महत्या की अनुमति दें। शबाना ने खत में साफ लिखा है कि वह ऐसे पर्सनल लॉ को नहीं मानती जो औरतों पर अत्याचार होते देखता है और इसीलिए आज वे देश के सामान्य कानून के तहत न्याय की मांग कर रही हैं।

पत्रिका से बातचीत में शबाना ने बताया कि मैं नर्स बनना चाहती थी, लेकिन मेरा पति मुझसे खेतों में काम कराना चाह रहा था। मैं सब दुख झेलकर भी वहां रह रही थी। मैंने इसका विरोध किया तो मना करने पर मेरे साथ मारपीट करता था। जब मैं बेटी के साथ अपने मायके आ गई तो उसने मुझे तलाक दे दिया। मेरी चार साल की लड़की है, उसका क्या होगा। अब मैं उसका पालन पोषण कैसे कर पाऊंगी। मैं परिवार के साथ रहना चाहती थी, लेकिन ऐसा नहीं होने दिया गया। दहेज के लिए भी मुझे प्रताडि़त किया, फिर पति ने पता भी नहीं चलने दिया और तुरंत ही दूसरी शादी कर ली। मेरे वजूद को खत्म करने की कोशिश की गई। मैं अपने मां-बाप पर बोझ नहीं बनना चाहती हूं। अब मैं न्याय चाहती हूं। भारत की आम नागरिक की तरह मुझे भी सुप्रीम कोर्ट से न्याय चाहिए। शबाना कहती हैं कि मुझे देश की न्याय व्यवस्था पर पूरा विश्वास है और उन्हें पता है कि एक दिन उन्हें उनका उचित हक जरूर मिलेगा।

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अर्जुन रिछारिया Incharge
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