भाजपा के स्वास्थ्य मंत्री को हराने वाले मच्छर ने ली 200 लोगों की जान

भाजपा के स्वास्थ्य मंत्री को हराने वाले मच्छर ने ली 200 लोगों की जान

 

By: Lalit kostha

Published: 18 Dec 2018, 02:25 PM IST

जबलपुर. स्वास्थ्य के क्षेत्र में वर्ष 2018 विवादों से घिरा और उथल-पुथल भरा रहा। पूरे साल मेडिकल कॉलेज का सुपर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल सुर्खियों में रहा। इसे कई बार शुरू करने की कवायद हुई। मंत्रियों के दौरे भी तय हुए, लेकिन सौगात नहीं मिल सकी। मरीजों के लिहाज से साल बेहद खराब रहा। डेंगू, चिकनगुनिया, वायरल बुखार से आधी आबादी त्रस्त रही। 200 से ज्यादा लोगों की जिंदगी खत्म हो गई। यह चुनावी मुद्दा भी बना। शिक्षा के क्षेत्र में कई बड़े बदलाव होने से भविष्य में शिक्षा के बेहतर ढांचे की उम्मीद बंधी। परीक्षा और परिणाम की घोषणा में लेटलतीफी दूर नहीं हुई।

news facts

सालभर में डेंगू से गईं 200 से ज्यादा जानें मुश्किल में मरीज,
फिर भी सुपर स्पेशिएलिटी अधूरा

बड़े घटनाक्रम
जुलाई से अक्टूबर तक चिकनगुनिया, वायरल, डेंगू के मरीजों की भीड़ उमड़ी, तब विक्टोरिया अस्पताल में पैथोलॉजी जांच बंद रही। बीमारी कम होने के बाद लैब की मशीनें ठीक हुईं।

एल्गिन अस्पताल को प्रसूताओं और नवजातों की बेहतर देखभाल के लिए स्टेट क्वालिटी एसोरेंस सेल (एसक्यूएसी) ने प्रमाणीकरण पत्र जारी किया। लक्ष्य योजना में अव्वल आया।

मेडिकल कॉलेज के कर्मचारियों, नर्सेस और जूनियर डॉक्टरों ने जुलाई में एक साथ हड़ताल की। मरीज परेशान हुए। बर्खास्तगी की तलवार लटकी तो हड़ताली दो फाड़ हो गए।

चिकित्सा शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव ने मेडिकल यूनिवर्सिटी का कद घटाकर आधा कर दिया। इसके बाद सीएम और राज्यपाल ने प्रशासनिक भवन का दो बार अलग-अलग शिलान्यास किया।

पूर्व मुख्यमंत्री की बहू डॉ. रचना त्रिवेदी का जिला अस्पताल से इस्तीफा सोशल मीडिया में वायरल होने से हड़ंकम्प मचा। प्राइवेट प्रैक्टिस करते पकड़े गए डॉ. सिद्दकी का नाटकीय इस्तीफा हुआ। आइएमए की स्टेट कॉन्फ्रेंस में नए अध्यक्ष का पदभार ग्रहण भी विवाद के घेरे में रहा।

मेडिकल कॉलेज : स्टेट कैंसर रिसर्च सेंटर का इंतजार बना रहा। न्यूरो सर्जरी, टीबी एंड चेस्ट डिपार्टमेंट को स्कूल ऑफ एक्सीलेंस के रूप में विकसित करने की शुरुआत हुई। बारिश में सीवर लाइन चोक होने से गंदा पानी वार्डों तक पहुंच गया। ऑक्सीजन नॉब खोलने में लापरवाही से विस्फोट जैसी घटनाएं हुईं। सम्भागायुक्त का दखल बढ़ा।

सरकारी अस्पताल : कलेक्टर ने विक्टोरिया अस्पताल के कायाकल्प को लेकर सक्रियता दिखाई। जांच में ओपीडी से डॉक्टर्स गायब मिले। किसी डॉक्टर पर कार्रवाई नहीं होने से स्थिति नहीं सुधरी। साल के अंत तक कायाकल्प कमजोर पड़ गया। एल्गिन अस्पताल को 300 बिस्तर का दर्जा मिला। यहीं से आयुष्मान बीमा योजना का ट्रायल हुआ। सिविल अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर्स के गायब रहने और मरीजों की असमय मौत पर विवाद हुए।

मेडिकल यूनिवर्सिटी : प्रतिनियुक्ति पर अधिकारियों की नियुक्ति नहीं हुई। विद्यार्थियों की बायोमेट्रिक अटेंडेंस, अनुपस्थित छात्रों के निष्कासन, इंस्पेक्टर्स के निरीक्षण, प्रायोगिक परीक्षा की वीडियोग्राफी सहित उत्तर पुस्तिकाओं के ऑनलाइन मूल्यांकन की शुरुआत हुई। मेडिकल परीक्षा में देश में पहली बार हिन्दी में जवाब लिखने की आजादी दी गई। परिणाम, अंकसूची में गड़बडिय़ों को लेकर परीक्षा और गोपनीय विभाग के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहे।

Lalit kostha Desk
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