ध्यान लगाते ही हवा में उडऩे लगता था योगी, जानें उडऩे का रहस्य

आईये जानते हैं ऐसे ही योगियों के बारे में....

By: Lalit kostha

Updated: 11 Dec 2017, 12:07 PM IST

जबलपुर। आज ओशो का जन्मोत्सव पूरे देश में धूमधाम से मनाया जा रहा है। ओशो के अनुयायी उनकी उपस्थिति को आज भी मेडिटेशन के माध्यम से महसूस करते हैं। देवताल उद्यान स्थित ओशो आश्रम में तो विशेष आयोजन हो रहा है। देशभर से अनुयायी उनकी याद में झूम रहे हैं, मंत्रमुग्ध होकर वे केवल ओशो में ही खो जाना चाहते हैं। लेकिन ये बात बहुत ही कम लोग जानते हैं कि संस्कारधानी जबलपुर में केवल ओशो ही नहीं बल्कि और भी कई योगी महात्मा हुए हैं जिन्होंने देश दुनिया में अपना परचम लहराया और संस्कार संस्कृति से शांति का मार्ग लोगों को दिखाया है। आईये जानते हैं ऐसे ही योगियों के बारे में....

 

ओशो रजनीश
आचार्य रजनीश यानी ओशो का नाम भी किसी छिपा नहीं है। ओशो ऐसे महान साधक और योगी थे कि जब वे ध्यान करते थे तो एक अलग दुनिया में चले जाते थे। ओशो संस्थान से जुड़े रामेश्वर गुप्ता के अनुसार इस बात प्रमाण आज भी हैं कि जब ओशो जबलपुर के देवताल स्थिति ध्यान शिला या भंवरताल उद्यान के बीच स्थित मौलिश्री के वृक्ष के नीचे बैठते थे तो कहीं खो जाते थे। वे कहते थे योग में बड़ा बल है। यह आत्मा का परमात्मा से साक्षात्कार कराने का माध्यम है। वर्तमान में योगासनों के रूप में लोग इसकी बेहद छोटी इकाई का अभ्यास कर रहे हैं। यह स्वास्थ्य के लिए लाभकर है। उससे ऊपर की सीढ़ी आत्म तत्व को लाभ पहुंचाती है।


हर पहलू पर रखे विचार
अनुयायी नमन श्रीवास्तव ने बताया कि ओशो ने मानव जीवन से जुड़े हर पहलू का गहन विश्लेषण किया और लोगों को आत्म शांति के साथ अध्यात्म का रास्ता दिखाया। उन्होंने संस्कृति की अपेक्षा स्वयं के विकास पर ज्यादा जोर दिया। स्वामी शिखर ने बताया कि ओशो ने पाया कि पाश्चात्य संस्कृति में भौतिक शांति जरूर मिल जाती है लेकिन अंत में मन की शांति के लिए वे भारत और योग की तरफ रुख करते हैं। योग में जीवन की सार्थकता छिपी हुई है।

जब प्रोफेसर से हुआ संवाद
- ओशो ने सन् 1951 में जबलपुर के हितकारिणी सिटी कॉलेज में एडमिशन लिया और 1953 तक पढ़ाई की।
- पढ़ाई के दौरान एक प्रोफेसर लॉजिक पर लेक्चर दे रहे थे तभी रजनीश से उनका डिबेट हुआ। रजनीश के तर्क इतने सटीक थे कि कक्षा में बैठे लगभग 70 छात्रों ने टेबल थपथपा कर तालियां बजायीं।
- इसके बाद कॉलेज के प्रिंसिपल ने उन्हें बुलाया और कहा कि, हम अपने प्रोफेसर को तो निकाल नहीं सकते पर तुमसे निवेदन है कि तुम यह कॉलेज छोड़ दो और हम तुम्हारी डिग्री और सर्टिफिकेट में कुछ भी ऐसा नहीं लिखेंगे जो तुम्हें हानि पहुंचाए।
- इसके बाद डी.एन.जैन कॉलेज के प्रिंसिपल ने रजनीश को बुलाया और कहा कि मैं तुम्हें अपने कॉलेज में एडमिशन दे सकता हूं पर शर्त यह है कि तुम लॉजिक का पीरियड अटेंड नहीं करोगे, ओशो मान गए और उस पीरियड के दौरान वे अक्सर कॉलेज के बाहर बने कुएं की पाटी पर बैठे रहते थे।

एक नजर ओशो पर...
- रजनीश का जन्म मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के कुचवाड़ा गांव में हुआ था।
- ओशो का मूल नाम चन्द्र मोहन जैन था। वे अपने पिता की ग्यारह संतानो में सबसे बड़े थे।
- उनके माता पिता बाबूलाल और मां सरस्वती जैन तेरापंथी जैन थे। वे अपने ननिहाल में 7 वर्ष की उम्र तक रहे।

- ओशो ने एक जगह बताया है कि, उनके विकास में प्रमुख योगदान उनकी नानी का रहा है। उन्होंने संपूर्ण स्वतंत्रता, उन्मुक्तता तथा रूढ़िवादी शिक्षाओं से दूर रखा।
- जब वे 7 वर्ष के थे तब उनके नाना का निधन हो गया और वे 'गाडरवाड़ाÓ अपने माता पिता के साथ रहने चले गए।
- 'ओशो' शब्द लैटिन भाषा के शब्द ओशैनिक से लिया गया है, जिसका अर्थ है 'सागर में विलीन' हो जाना।
- 1960 के दशक में वे 'आचार्य रजनीश' के नाम से एवं 1970-80 के दशक में भगवान 'श्री रजनीश' नाम से और 1989 में 'ओशो' नाम से फेमस हुए।

ये योगी भी जानते थे उडऩे कला
संस्कारधानी धर्म और आध्यात्म की नगरी है। यहां ऐसे योगी और महायोगी पैदा हुए हैं, जिनके बारे आज भी तरह तरह की किंवदंतियां प्रचलित हैं। लोग बताते हैं गोसलपुर वाले दादा के नाम से प्रसिद्ध प्रसि रहे दादाश्री अचानक अदृश्य हो जाते थे। ठठनपाल वाले महाराज और धूनी वाले बाबा के विषय में ही ऐसी ही जानकारियां प्रचलित हैं। यही जानकारियां और आस्था आज भी लोगों को उनसे जोड़े हुए है।

हवा में तैरने की शक्ति
भावातीत ध्यान से जुड़े योगाचार्य एएल पयासी बताते हैं कि भावातीत ध्यान, योग की ही एक परिष्कृत विधा है। यदि इसे आचरण और शरीर में समाहित कर लिया जाए तो व्यक्ति अपने आप अदृश्य हो सकता है। एक साथ, एक ही समय मेें कई जगह जा सकता है। वह पक्षियों की तरह हवा में उड़ सकता है। भावातीत ध्यान प्रणेता महर्षि महेश योगी इस योग कला के सिद्धहस्त थे। उनके बहुत से अनुयायी इस बात को जानते हैं कि महर्षि जी ध्यान के समय कई बार आसन से अपने आप उठकर हवा में तैरने लगते थे। महर्षि यही कहते थे कि सतत अभ्यास से हर व्यक्ति इस विधा को सीख सकता है।

महर्षि का जबलपुर से रिश्ता
संपूर्ण विश्व में भारतीय सनातन धर्म और संस्कृति की धर्म ध्वजा फहराने वाले महर्षि महेश योगी का जन्म 12 जनवरी, 1917 को मध्य प्रदेश के जबलपुर में कायस्थ परिवार में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से फिजिक्स विषय से ग्रेजुएशन किया। 22 साल की उम्र में 1939 में वे शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती के शिष्य बन गए। करीब 13 साल तक उनके सानिध्य में धर्म, अध्यात्म की शिक्षा प्राप्त की। महर्षि महेश योगी ने शंकराचार्य की मौजूदगी में रामेश्वरम में एक बड़ा धार्मिक आयोजन किया था। वहां उन्होंने 10 हजार बाल ब्रह्मचारियों को आध्यात्मिक योग और साधना की दीक्षा दी थी।


हिमालय में की थी मौन साधना
महर्षि के अनुयायी जादूगर एसके निगम के अनुसार महर्षि महेश योगी ने देव भूमि हिमालय क्षेत्र में दो वर्ष की मौन साधना की थी और पारलौकिक सिद्धियां प्राप्त करने के बाद 1955 में उन्होंने भावातीत ध्यान सिखाना शुरू किया। 1957 में अमरीका गये और विश्व अध्यात्म आन्दोलन की शुरू किया। 1969 में महर्षि ने एक बड़े कार्यक्रम में एक साथ करीब 4 लाख अमरीकी युवाओं को सम्बोधित कर उन्हें भारतीय अध्यात्म से जुडऩे के लिए प्रेरित किया था।

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