नक्सली लीडर से विवाद के बाद आज पुलिस इंस्पेक्टर बन चुका है आत्मसमर्पित बदरू, नक्सली संगठन के खोले पूरे राज

नक्सली लीडर निर्मला से विवाद के बाद किया था सरेंडर, नक्सली मोर्चों पर बहादुरी का इनाम दिया सरकार ने

दंतेवाड़ा- देश के नक्सल आंदोलन के इतिहास में सरेंडर के बाद पहली बार 5 आऊट आफ टर्न प्रमोशन पाकर पुलिस इंस्पेक्टर बनने वाले पूर्व नक्सली संजय पोटाम उर्फ बदरू का मानना है कि नक्सलवाद अब सिर्फ छलावा बनकर रह गया है। बस्तर के जो लोग नक्सली बनकर जंगलों में घूम रहे हैं, उनमें से ज्यादातर को माओवाद क्या है, ये नहीं पता। सिर्फ दबाव में नक्सली संगठन के साथ जुड़े और फिर गहराई से इसमें धंसते चले गए। ऐसे लोगों को भी सरेंडर कर मुख्य धारा में लौटना चाहिए। छत्तीसगढ़ सरकार सरेंडर करने वाले नक्सली कैडर को अब इतना बेहतर पैकेज दे रही है जिससे वे शहर में रहकर इतना बेहतर जीवन जी सकते हैं जितना गांव में रहकर भी नहीं जी सकते। अपने परिवार और बच्चों का भविष्य बेहतर बना सकते हैं। कभी नक्सलियों के दरभा डिवीजन का डीवीसी सेक्रेटरी रह चुके संजय पोटाम उर्फ बदरू ने वर्ष 2013 में दंतेवाड़ा एसपी के समक्ष सरेंडर किया। दशकभर से ज्यादा समय तक नक्सली संगठन में रहकर आतंक मचाने के बाद डीवीसी सेक्रेटरी निर्मला से उसके गहरे मतभेद हुए और संगठन से उसका मोहभंग हो गया। सरेंडर के बाद गोपनीय सैनिक के तौर पर उसने नक्सल विरोधी अभियानों में पुलिस के साथ मिलकर कई नक्सली कैंप नेस्तनाबूत किए। नक्सलियों की रणनीति व अन्य तौर तरीकों से अच्छी तरह वाकिफ होने से पुलिस को को काफी मजबूती मिली। जिससे 7 साल के भीतर दंतेवाड़ा पुलिस को कई बड़ी सफलताएं मिली। अब वह नक्सलियों की हरी या काली वर्दी नहीं पहनाता बल्कि फोर्स की कामाफ्लॉज वर्दी पहनकर नक्सली विरोधी ऑपरेशनों में बढ़.चढक़र हिस्सा लेता है।

आत्म समर्पण के बाद पुलिस बनकर अपनी बहादुरी से 5 आऊट आफ टर्न प्रमोशन कर इंस्पेक्टर के ओहदे तक पहुंचने वाले पूर्व नक्सली और वर्तमान पुलिस इंस्पेक्टर संजय पोटाम उर्फ बदरू से पत्रिका संवाददाता की एक्सक्लूसिव बातचीत के अंश..

सवाल- सरेंडर के बाद कैसा महसूस कर रहे हैं?
जवाब- बहुत खुश व संतुष्ट हूं। पहले जंगल का जीवन बहुत कठिन था। व्यक्तिगत जीवन के लिए कोई मायने नहीं थे। परिवार और बच्चों का कोई भविष्य नहीं था। जब से मुख्य धारा में लौटा हूंए बच्चों की पढ़ाई.लिखाई और पारिवारिक जीवन बेहतर हो गया है। सरेंडर के बाद पत्नी को भी नौकरी मिली है। वह भी खुश है।

सवाल. नक्सली संगठन से जुड़ाव कैसे हुआ?
जवाब. जब नक्सली संगठन से जुड़ा तब जुड़ूम का दबाव चल रहा था। माओ या उसके सिद्धांत के बारे में कुछ नहीं जानता था। बस संगठन में जुड़े तो नक्सली बनकर काम करते चले गए। अब भी ज्यादातर लोग नहीं जानते हैं। संगठन में जो चीजें कही जाती हैं वह व्यवहार में संभव नहीं है।

सवाल- नक्सलवाद से बस्तर पर क्या असर हुआ है?
जवाब- अगर बस्तर से नक्सलवाद खत्म हुआ तो बस्तर भी बाकी जगहों की तरह समृद्ध हो जाएगा। नक्सलवाद के कारण न तो लोग बाजार जा पा रहे हैं, और न ही अपना कामकाज सामान्य ढंग से कर सकते हैं। आधी पीढ़ी डर के बीच जी रही है।

सवाल-सरेंडर करते वक्त सोचा था कि कभी इंस्पेक्टर बन पाएंगे?
जवाब- नहीं, कल्पना भी नहीं की थी कि इतने सारे प्रमोशन मिलेंगे। लेकिन जैसे-जैसे काम करते गए सफलता मिलती गई। गोली पहले भी चलाते थे, अब भी चलाते हैं। लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि पहले बंदूक की नली इस तरफ तानते थे अब जनता की सुरक्षा के लिए नक्सलियों की तरफ तानते हैं।

सवाल- क्या ऐसा लगता है कि नक्सलवाद को पीछे धकेलने में नक्सलियों के सरेंडर कैडर का हाथ है?
जवाब- बिल्कुल सरेंडर कैडर की वजह से नक्सलियों को काफी नुकसान पहुंचा है। नई भर्तियां नहीं हो पा रही हैं। पहले हार्डकोर नक्सलियों की संख्या बहुत ज्यादा थी। अब घटकर 200 से भी कम हो गई है। टीसीओसी में सारे जगह के नक्सली मिलकर बड़ी घटना को अंजाम दिए तब कहीं कसालपाड़ जैसी घटना हो सकी।

सवाल- सरकार के नई नीति से नक्सली संगठन को कितना नुकसान पहुंचाया है?
जवाब- अंदरूनी इलाकों में सडक़, पुल-पुलिए बनने और नए कैंपों की स्थापना से नक्सली कमजोर पड़े हैं। पूर्वी बस्तर डिवीजन लगभग खत्म हो चुका है। दक्षिण बस्तर डिवीजन काफी कमजोर पड़ चुका है। माड़ डिवीजन व पश्चिम-दक्षिण डिवीजन ही फिलहाल मजबूत है। इन इलाकों में मेन रोड से 40 किमी के दायरे में जैसे-जैसे सडक़ें बनेंगी और फोर्स के कैंप लगेंगे लोग प्रशासन व फोर्स का साथ देने लगेंगे। सरकार की पहुंच इन गांवों तक होगी तो अपने आप नक्सली कमजोर पड़ते जाएंगे।

सवाल- नक्सली संगठन में बाहरी नक्सलियों के हावी होने की बात कितनी सच है?
जवाब- नक्सली संगठन में आंध्र के नक्सलियों का ही दबदबा है। डीवीसी के ऊपर सभी लोग आंध्र मूल के हैं। हर डिवीजन में आंध्र का एक-एक नक्सली बैठा है जो लड़ते नहीं हैं सिर्फ प्लानिंग कर साथियों को फोर्स से लड़ाने का काम करते हैं। खुद सुरक्षित जगहों पर बैठे रहते हैं। बस्तर के स्थानीय नक्सलियों को संगठन चलाने की जिम्मेदारी नहीं दी जाती है। स्थानीय नक्सली हिड़मा को अगर डीवीसी की जिम्मेदारी मिली भी है तो सिर्फ लड़ाका होने की हैसियत से संचालन के लिए नहीं।

Badal Dewangan
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