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World autism day : दिल छोटा ना करें, आप मम्मा-डेडी के सबसे अच्छे बच्चे हो…

World Autism Day : ऑटिस्टिक बच्चे (Autistic Kids) के सामने चुनौतियां यूं ही कम नहीं होती लेकिन पेरेंट्स का इस मामले में लापरवाही बरतना, सच को स्वीकार न करना, बच्चे से दूरी बना लेना इन बच्चों की समस्या को और गंभीर बना देता है। इन बच्चों की अपनी अलग दुनिया होती है। उसे समझना न केवल उसके पेरेंट्स बल्कि हर व्यक्ति, समाज के लिए जरूरी हो गया है। यह कहना है ऑटिज्म पीडि़त बच्चों के परिजनों का।

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World Autism Day : ऑटिस्टिक बच्चे (Autistic Kids) के सामने चुनौतियां यूं ही कम नहीं होती लेकिन पेरेंट्स का इस मामले में लापरवाही बरतना, सच को स्वीकार न करना, बच्चे से दूरी बना लेना इन बच्चों की समस्या को और गंभीर बना देता है। इन बच्चों की अपनी अलग दुनिया होती है। उसे समझना न केवल उसके पेरेंट्स बल्कि हर व्यक्ति, समाज के लिए जरूरी हो गया है। यह कहना है ऑटिज्म पीडि़त बच्चों के परिजनों का। उनका कहना है कि उन्हें दुख है कि उनका बच्चा कभी मां-पापा नहीं बोलेगा फिर भी सतर्क और उसके हर पल साथ रहते हैं। न केवल उसे अपनी दुनिया में खुश रहना सीखा रहे हैं बल्कि वे उसे आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश में भी जुटे हैं।

बेटे के लिए 13साल से नहीं गए ऑफिस

- श्याम नगर निवासी सुदीप सुरेश ने बताया कि बेटे सक्षम ने साढ़े तीन साल की उम्र में अचानक से बोलना बंद कर दिया था। उसके इलाज डॉक्टर ही नहीं, नीम हकीम के पास भी गए। जब पता चला कि उसे वह ऑटिज्म (Autism) का शिकार हो गया है। उसके बाद हर पल उसके साथ बिता रहे हैं। उन्होंने बताया कि वे एक आइटी कंपनी के प्रोग्राम मैनेजर कार्यरत है। 13 साल से वर्क फ्रोम होम कर रहे हैं। क्योंकि बेटा अब 21 साल का हो चुका है। जब कभी बेटा अचानक से अग्रेसिव हो जाता है। उसे संभालने की उनका रहना जरूरी है।

मां खुद बन गई टीचर

- विधाधर निवासी रीना ने बताया कि बेटे प्राम्शु (19) का पौने दो की उम्र में ही व्यवहार में अचानक परिवर्तन आ गया। वह अकेले रहना पसंद करने लगा। बोलना भी बंद कर दिया। हम सब घबरा गए थे। जेके लोन अस्पताल (JK Lone Hospital) लेकर गए तो, वहां चिकित्सकों ने बताया कि वह ऑटिज्म ग्रस्त हो गया है। उसके बाद से उसकी केयर में जुट गई। उसे स्पेशल बच्चों के स्कूल में भर्ती कराया। बच्चे के साथ क्लास में बैठकर उन्होंने खुद ने स्पेशल एजुकेशन का कोर्स किया। अब ज्यादातर समय उसके साथ बिताती है। खुशी है, उसे पूरी तरह से आत्म निर्भर बना दिया है। खुद का पूरा काम खुद कर लेता है। उसने डायरी बनाना भी सीख लिया है। अब वह घर में अकेला भी रह लेता है।

दूसरे परिजनों को ढूंढकर बनाया Group

-वैशाली नगर निवासी अनुराग श्रीवास्तव ने बताया कि उनका बेटा वत्सल डेढ़ साल की उम्र में ऑटिज्म से पीडि़त हो गया था। नौकरी के दौरान उन्हें काफी दिक्कते आयी। 2011 में जयपुर आए तब ऑटिज्म से ग्रस्त अन्य बच्चों के परिजनों को ढूंढकर गुंरप बनाया। अब 25 परिवार मिलकर इन बच्चों को आत्म निर्भर बनाने में जुटे हैं। इसके लिए तीन साल पहले उन्होंने नौकरी भी छोड़ दी। उनकी पत्नी गरिमा बेटे के लिए पहले खुद ट्रेनिंग ली फिर दूसरों को देना शुरू किया।

उनका कहना है कि उन्हें दुख है कि उनका बच्चा कभी मां-पापा नहीं बोलेगा फिर भी सतर्क और उसके हर पल साथ रहते हैं। न केवल उसे अपनी दुनिया में खुश रहना सीखा रहे हैं बल्कि वे उसे आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश में भी जुटे हैं।

विधाधर निवासी रीना ने बताया कि बेटे प्राम्शु (19) का पौने दो की उम्र में ही व्यवहार में अचानक परिवर्तन आ गया। वह अकेले रहना पसंद करने लगा। बोलना भी बंद कर दिया। हम सब घबरा गए थे। जेके लोन अस्पताल (JK Lone Hospital) लेकर गए तो, वहां चिकित्सकों ने बताया कि वह ऑटिज्म ग्रस्त हो गया है।