लघुकथा-मेरा धर्म, मानव धर्म

अब वे सब अपनी-अपनी कुर्सियों पर यूं बैठ गए जैसे किसी ने कुर्सियों से चिपका दिया हो। जैसे मुंह पर किसी ने ताले जड़ दिए हों। सभा को जैसे सांप सूंघ गया।

By: Chand Sheikh

Published: 21 Nov 2020, 11:26 AM IST

मेरा धर्म, मानव धर्म

डॉ. पद्मजा शर्मा

वे मुझसे बड़े थे। मुझो समझाया गया था बड़ों से कभी जबान नहीं लड़ाते। उनके सामने मैं सकुचाई हुई थी। वो सुना रहे थे। मैं सुन रही थी। मेरी बारी आई। मैंने खड़े होकर विनम्रता से अपना मत रखा। नत मस्तक हो मैंने कहा-'स्त्री भी इंसान है जैसे आप लोग।'

वे शोर मचाने लगे। मुझो बोलने ही नहीं दिया। मैं बैठ गई। वे सब अपनी कुर्सियों से उठ खड़े हुए और मुझा पर फब्तियां कसने लगे। अरे, हम तो तुम्हें देवी का दर्जा देते हैं। एक तुम हो कि समानता, समता, स्वतन्त्रता की बड़ी-बड़ी बातें करती फिरती हो। दो अक्षर पढ़कर तुम खुद को बड़ा समझ रही हो। तुम हर किसी के घर का पानी पी लेती हो। तुम अकेली घर से बाहर निकलती हो। तुमने दुपट्टा छोड़ दिया है। जींस टॉप पहनती हो। तुम साड़ी से भी दूर जा रही हो। तुम्हारी मांग का सिंदूर कहां है? सिर का पल्लू कहां है? तुम्हारी पायल, बिछुए कहां हैं? तुमने हमारी संस्कृति को धूमिल किया है। तुमने बाल कटवा लिए हैं। तुमने प्रेम विवाह किया है। तुमने विधर्मी से शादी की है। तुम्हारा धर्म क्या है?

ये सब सुनकर उनके सम्मान में झाुकी मेरी गर्दन थोड़ी उठी। रीढ़ की हड्डी थोड़ी सीधी हुई। मैंने एक लंबी, गहरी सांस ली और तनकर खड़ी हुई। और मैंने कहा -मेरा धर्म, मानव धर्म है। किसी को एतराज?
वे मेरे ये तेवर देखकर भयभीत थे। उन्हें विश्वास नहीं था कि यह वो मैं हूं जो उनके सामने मिमियाती थी। गर्दन झाुकाए खड़ी रहती थी। डराते थे, डर जाती थी।

अब वे सब अपनी-अपनी कुर्सियों पर यूं बैठ गए जैसे किसी ने कुर्सियों से चिपका दिया हो। जैसे मुंह पर किसी ने ताले जड़ दिए हों। सभा को जैसे सांप सूंघ गया।

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तमाशबीन

रोहिताश्व शर्मा

तेज ब्रेक लगने से गाडी के टायरों की रगड़ की तीखी आवाज करती हुई कार ने मोटर साइकिल को टक्कर मार दी। मोटर साइकिल सवार नौजवान गिर गया था। कुछ लोग अपने वाहन रोक कर एक्सीडेंट के स्थान की ओर दौड़ पड़े। कुछ ने बाहें चढ़ा ली और कार का दरवाजा खुलवाने के लिए कार पर मारने लगे। कार ड्राइवर अंदर से हाथ जोड़ रहा था। मोटर साइकिल से गिरा युवक धीरे से अपने आप खड़ा हुआ। हल्का लंगड़ाता हुआ वह कार के पास पहुंचा। कार ड्राइवर हाथ जोड़कर बोला- 'भाईसाहब माफ कर दीजिए।'

बांह चढ़ाए युवकों ने मोटर साइकिल सवार को जोश दिलाते हुए कहा,'बातों में आने की जरूरत नहीं है। खबर लीजिए इस कार वाले की। हम आपके साथ हैं। सड़क चलता आदमी दिखाई नहीं देता।'

उनको रोकते हुए युवक बोला 'भाई साहब रुकिए। गलती मेरी है। मैं बिना इंडिकेटर दिए एकदम से मुड़ गया। इन भाईसाहब ने तो गाड़ी पर पूरे ब्रेक लगाए नहीं तो बड़ी दुर्घटना हो सकती थी।'

नौजवान की बात सुन बांहे चढ़ाए लोग उस पर नाराज होते हुए अपने वाहनों की तरफ वापस मुड़ गए। कुछ लोग अब भी दुर्घटना स्थल की ओर आ रहे थे। उन्हें रोकते हुए उन्होंने कहा, ' कहां जा रहे हो? कोई फायदा नहीं है। समझादार लोगों का एक्सीडेंट है, एकदम नीरस।'

Chand Sheikh Desk
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