इन दिनों

कोरोना महामारी से कुछ अच्छे बदलाव भी प्रकृति और इंसानों के बीच देखने को मिल रहे हैं। इस भाव को व्यक्त कर रही है यह कविता।

By: Chand Sheikh

Published: 27 May 2020, 01:29 PM IST

कविता

राजूराम बिजारणियां

आसमान में बढ गई है
तारों की संख्या इन दिनों
पता लगा है
*हिरनी और *कीर्ति भी कायम है
अपनी जगह अब तलक
चांद की बढ गई है शोखियां।

फकत गांव की छत पर
आने वाली आकाश गंगा
झाुकती है इन दिनों
नगरों-महानगरों के गुबंदों पर भी!

हिमालय की टूट गई है बाड़
हट गया है पर्दा उसके चेहरे से
अब कोसों दूर जाता है वह उन तलक
जो बीता रहे हैं
कसौटी पर कसे जा रहे आज को,
कल के इंतजार में।

हवा की खुल रही है बंदिशें
आंखें अब देखती हैं दूर तक
सुस्ता रही गाडिय़ां गैरेज में
ध्वनि के साथ उड़ गया धुआं
शांत चित सड़कें..
नहीं बहा जो लहू किसी का इन दिनों.!

चहक रही हैं
बेटियां घर में
चिडिय़ा नभ में
अभयदान के साथ..
पंछियों के संवर रहे हैं दिन.!

बीवियां खुश हैं
मांओं को भी तसल्ली है
कि उनके आंगन हो गए हैं नेह भरे
कहानियां रिवीजन कर रहे हैं दादा-दादी
बच्चों के सपनों में लौट रही हैं परियां

किसी को नहीं है शिकायत
अब समय की कमी को लेकर
तेरा-मेरा, कम-ज्यादा
जैसे शब्द लिखे पन्ने
फट गए हैं शब्द कोष से.!

हां..धरती के प्रसव काल में
कुछ कष्ट तो लाजमी है
घर की फिक्र से इतर
लड़ रहे हैं कई योद्धा..
और घरों में बैठे लोग भी समझा रहे हैं
संतोष की परिभाषा
सुना है बढ रहा है आदमी का धैर्य भी
इन दिनों!

(*सप्तऋषि मंडल की तरह हिरनी और कीर्ति तारा समूह के नाम हैं।)

कवि अध्यापन से जुड़े हैं

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