पीढ़ी को तात्विक व जीवन के वास्तविक विज्ञान का ज्ञान कराने वाला, पढ़ें विज्ञान वार्ता पर प्रतिक्रिया

राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक श्री गुलाब कोठारी जी की ओर से लिखा गया अग्रलेख गर्भकाल में ईश्वर जीव संवाद बेहद ज्ञानवर्धक है। जिसमें बताया गया है कि सृष्टि के आरंभ का संपूर्ण वर्णन प्रलय काल का है।

By: kamlesh

Published: 28 Nov 2020, 06:40 PM IST

राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक श्री गुलाब कोठारी जी की ओर से लिखा गया अग्रलेख गर्भकाल में ईश्वर जीव संवाद बेहद ज्ञानवर्धक है। जिसमें बताया गया है कि सृष्टि के आरंभ का संपूर्ण वर्णन प्रलय काल का है। सृष्टि का पूर्ण लय हो जाने के कारण ब्रह्मा पुनः मूल स्वरूप में लौट आता है। ब्रह्मा का स्वभाव क्षर अक्षर है। गर्भावस्था में क्षर पूर्ण रूप से क्रियाशील रहता है। संपूर्ण गर्भकाल काल में जीवन पर आसुरी शक्तियों का आक्रमण निरंतर होता रहता है। यह ही मधु-केटव, शुंभ-निशुंभ व रक्तबीज आदि नामों से उल्लेखित है।
- खेमचंद मीणा, बैंक कर्मचारी अलवर।

सत्य की विजय होती है-
अग्रलेख मे बताया है कि सम्पूर्ण गर्भकाल में जीवन पर आसुरी शक्तियों का आक्रमण निरन्तर होता रहता है। ये ही मोह, क्रोध व लोभ आदि प्रवृत्तियां हैं जो जीव को दुबारा अपने वश में करने को तत्पर दिखाई देता है। ऐसे में केवल सद्कर्म ही इन असुरी शक्तियों से हमें बचा सकते हैं। वर्तमान में आवश्यकता है कि हम सच्चाई के मार्ग पर चले और असुर शक्तियों पर विजय प्राप्त करें।
-हरिकिशन खत्री, रंगकर्मी

आज हमारी स्वाध्याय की परम्परा लगभग छूट चुकी है। ग्रन्थों के स्वाध्याय से ही अनेक अनसुलझे प्रश्न स्वयं ही सुलझने लग जाते हैं। जन्म, आयु, भोग, मृत्यु आदि अत्यंत ही सूक्ष्म विषय हैं। सब साधनों से युक्त होकर क्रिया-योग्य जब शरीर होता है, तब जन्म होता है। जन्म शरीर और जीवात्मा इनका संयोग है। शरीर और जीवात्मा का वियोग मृत्यु कहलाता है।आत्मा सत-चित-स्वरूप है, आत्मा शरीर नहीं है। नित्य, अजर, अमर है. यह शरीर उसका निवास स्थान है।
- डॉ अरविंद शर्मा, बीसीएमओ, राजकीय चिकित्सालय संगरिया

मनुष्य को अपने कर्म फल भोगने ही पड़ते हैं। ऐसे में निश्चय ही हम सबको अच्छे कर्म करने चाहिए ताकि मानव जीवन में हम अपने लिए और समाज के लिए कुछ अच्छा कर सकें। श्रद्धेय गुलाब जी ने ठीक लिखा है कि कर्म पर आधारित जीवन ही हम सब को जीना होगा।
- वेद प्रकाश नोखवाल, शिक्षक, हनुमानगढ़ जंक्शन।

आलेख में कहा है कि गर्भस्थ अवस्था ही जीव को संस्कारित करने की प्रथम अवस्था होती है। इसलिए माता को प्रथम गुरु का दर्जा दिया जाता है, इसलिए जीव को मानवता के स्वरूप में प्रतिष्ठ करने की दृष्टि से गर्भस्थ ईवर-जीव संवाद मानना ही उचित होगा।
- उर्मिला भाटी ग्रहिणी,श्रीगंगानगर।

जीवन का अर्थ है,जो कल नहीं था और जो कल नहीं रहेगा, अर्थात जन्म अैर मृत्यु के बीच का काल। इसलिए तीन कालों के जीवन चक्र का आधार ही कर्म होता है। इसलिए मनुष्य को अच्छे कर्म करने पर ही अच्छा फल मिलेगा। कर्म से ही मनुष्टि महान होता है। आलेख में इसको प्रमुखता से बताया है।
- सरोज भाटी, कनिष्ठ अभियंता, श्रीगंगानगर।

आलेख में युवाओं को स्वाध्याय के साथ भारतीय संस्कृति का ज्ञान होता है । दुर्गा के रूपों का वर्णन किया गया है उससे युवाओं को जन्म आयु भोग मृत्यु आदि को लेकर सक्षम जानकारी मिलती है। सब साधनों में युक्त होकर क्रिया योग होता है तब जन्म होता है। जन्म मृत्यु आत्मा को लेकर सटीक जानकारी दी गई है।
- प्रवीण सिंह, छात्र बाडमेर

जन्म आयु भोग मृत्यु अत्यंत सूक्ष्म विषय है इन को लेकर जो आलेख में बताया गया है वह वास्तव में सोचने और समझने का विषय है। युवाओं को भारतीय ज्ञान विज्ञान से रूबरू कराता लेख जीवात्मा के सहयोग और मृत्यु को लेकर चिंतन करने को विवश करता है। आत्मा अजर अमर और शरीर उसका निवास स्थान है यह व्यक्ति को अच्छा करने की सीख देता है।
-यज्ञदत्त जोशी, अधिवक्ता, बाडमेर

आध्यात्मिक दर्शन से दूर भागते युवा वर्ग के लिए आलेख कारगर सिद्ध होगा। आलेख के माध्यम से कोठारी जी ने वेद विज्ञान की संपदा से परिचय करवाने का काम किया है। इस कार्य के लिए उनको साधुवाद है।
- हरि कृष्ण शर्मा, कथावाचक बीकानेर

मोह-माया और राग-द्वेष के चलते हम अपनी उन्नति में बाधक बन रहे हैं। आलेख पढ़कर मन को सुकून हुआ। आध्यात्मिक दृष्टि से यह आलेख बहुत ही महत्व रखता है। खासकर युवा पीढ़ी को इसे जरूर पढ़ना चाहिए।
- सुधा आचार्य पार्षद बीकानेर

आलेख में एक और गूढ़ दर्शन के विषय को पाठकों के समक्ष रखा गया है। देवी पूजन भारतीय संस्कृति का अनूठा भाव है। गुलाब जी ने एक सर्वथा नया दृष्टिकोण प्रस्तुत कर हम पाठकों का ज्ञानवर्धन किया। यह आलेख जीव को उसके मूल स्वरूप से अवगत करवाता है।
- मानवेन्द्र पुरोहित, तकनीकी शिक्षा छात्र, जैसलमेर

पत्रिका में आज प्रकाशित अग्रलेख बहुत उपयोगी और ईश्वर तथा जीव के संबंध को आमूल ढंग से परिभाषित करने वाला है। वेद मर्मज्ञ गुलाब कोठारी जी की कलम से इसी तरह के उच्च कोटि के लेखन की अपेक्षा सुधि पाठकों को रहती है। इस आलेख से आत्मा के परमात्मा से शाश्वत संबंध की व्याख्या हुई है। गुलाब जी की लेखनी ऐसे ही बुद्धजीवियों की जिज्ञासाओं का समाधान करती रहे, यही कामना है।
- आनंद कुमार आचार्य, जैसलमेर

आदरणीय गुलाब जी कोठारी की विज्ञान वार्ता में ईश्वर जीव संवाद से जीव को मानवता के स्वरूप में प्रतिष्ठित करने का ज्ञान मिला। यह सच है कि मनुष्य जब एकांतवास में होता है और दुनिया में रहते हुए भी हमसे जुड़ा रहता है। जीवन का अर्थ है जो कल नहीं था और जो कल नहीं रहेगा । अर्थात् जन्म और मृत्यु के मध्य का काल जीवन है । जीवन का आधार है पिछले जन्म भी है। जीवन - चक्र का आधार कर्म ही होता है ।
नेमीचंद शर्मा, चांदना भाकर, जोधपुर

ईश्वर जीव संवाद
ईश्वर जीव संवाद के लिए जीव की एकाग्रता जरूरी है और वह एकाग्रता एकांत में ही मिल सकती है और वह एकांत मनुष्य याने जीव को इस धरती पर आने से पहले ही मिलती है। वेद उपनिषद वेद विज्ञान की विपुल संपदा को परिचित कराने के उद्देश्य से राजस्थान पत्रिका के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी की विज्ञान वार्ता "गर्भकाल में ईश्वर जीव संवाद' से कई जीव संबंधी महत्वपूर्ण जानकारियां मिली। सनातन अवधारणा है कि हर प्राणी ब्रह्म है , सृष्टि को गति देने को संकल्पित है , अतः उसे भी प्रारम्भ में ही गीता का ज्ञान उपलब्ध हो जाना चाहिए । बिना गीता ज्ञान के जीवन अर्थ - काम प्रधान ही रह जाता है । यह आहार - निद्रा - भय - मैथुन रूप शुद्ध पशु क्षेत्र है । जीव को मानवता के स्वरूप में प्रतिष्ठित करने की दृष्टि से गर्भस्थ ईश्वर - जीव - संवाद मानना ही उचित होगा ।
रूपचंद सारस्वत, सूरसागर, जोधपुर

गर्भकाल में ईश्वर जीव संवाद के जरिए गुलाब जी ने जो जीवन का अर्थ बताया है, वो नई पीढ़ी खास कर विद्यार्थियों के लिए प्ररेणास्पद है। उन्हें आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भाव को इस अग्रलेख के जरिए जानने का मौका मिला है। कोरोना संकट काल में स्कूली छूटती पढ़ाई के बीच जीवन के दो पहलू 'ब्रह और कर्म Ó व गीता का ज्ञान के बारे में जो अध्यात्मिक धारा कोठारी जी ने बहाई है, उसके लिए साधुवाद।
नीरज शर्मा, वरिष्ठ शिक्षक, भीलवाड़ा

गर्भकाल में ईश्वर जीव संवाद एक सत्य है। पत्रिका के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी जी ने इसे बेहद ज्ञानवर्धक तरीके से समझाया है। सृष्टि के आरंभ से व प्रलय काल को बेहद विस्तार से समझाया है। स्त्री के गर्भकाल काल में आसुरी शक्तियों का आक्रमण निरंतर चलता है। आदिकाल में देवी ने मधु-केटव, शुंभ-निशुंभ व रक्तबीज आदि असूरों का संहार किया था। वर्तमान में मोह, क्रोध,लोभ आदि प्रवृत्ति आसुरी सरीखी है। गर्भकाल में जीव से संवाद होता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण द्वापर युग मे अभिमन्यु का है।
-प्रो लक्ष्मी ठाकुर, सेवानिवृत्त विभागाध्यक्ष एमडीएस यूनिवर्सिटी,अजमेर

गर्भकाल में ईश्वर जीव संवाद के जरिए गुलाब जी ने जो जीवन का अर्थ बताया है, वो नई पीढ़ी खास कर विद्यार्थियों के लिए प्ररेणास्पद है। उन्हें आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भाव को इस अग्रलेख के जरिए जानने का मौका मिला है। कोरोना संकट काल में स्कूली छूटती पढ़ाई के बीच जीवन के दो पहलू 'ब्रह और कर्म' व गीता का ज्ञान के बारे में जो अध्यात्मिक धारा कोठारी जी ने बहाई है, उसके लिए साधुवाद।
नीरज शर्मा, वरिष्ठ शिक्षक, भीलवाड़ा

विज्ञानं वार्ता में मनीषी गुलाब कोठारी वही विवेचन कर रहे हैं जो आज के समय में मानव जीवन की पूर्णता हेतु अत्यंत आवश्यक है आहार, निद्रा, भय और मैथुन। यदि मानव जीवन इन्हीं चार आवश्यकताओं पर ही चलता है तो मनुष्य जानवर की श्रेणी में ही रहकर अपना सर्वनाश कर लेता है और वर्तमान में अधिकांश मनुष्य इसी अंधकार में पशुवत जीवन बिता रहे हैं,विज्ञानं वार्ता राजस्थान पत्रिका का देदीप्यमान सूर्य है जिससे लाखों ह्रदय प्रकाशित होंगे।
- भरत कुमार सोनी ,उदयपुर

यह एक सटीक आलेख है जो यह सिद्ध करता है कि भारतीय संस्कृति और वैदिक ज्ञान प्रमाणिकता की कसौटी पर परखा हुआ है तथा ये परा प्रकृति के बहुत नजदीक है।
इसका एक एक शब्द, प्रत्येक नियम प्रकृति को उद्गारित करता है।
- डॉ अनुश्री राठौड़, उदयपुर (साहित्यकार, प्रकाशक)

ब्रम्हा व जीव की उत्पत्ति की समानता के साथ गुलाबजी ने जीवन की वैदिक विज्ञानमय व्याख्या प्रस्तुत की है। यह व्याख्या सनातनी ज्ञान को अधिक वैज्ञानिक व तर्कसंगत साबित करती है।
दिनेश कुमार, सेवानिवृत एक्सईएन, सीकर

देवताओं व राक्षसों की व्याख्या जीव व अवगुणों के रूप के साथ गुलाबजी ने मनुष्य के जन्म का विज्ञान बहुत ही साधारण व प्रभावी शब्दों में समझाया है। ऐसे लेख नई पीढ़ी को तात्विक व जीवन के वास्तविक विज्ञान का ज्ञान कराने वाले हैं।
पंडित उमाकांत शर्मा, ज्योतिषाचार्य, सीकर

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