एक को सक्रियता, दूसरे को सत्ता व सहानुभूति का सहारा

नागौर जिले के खींवसर विधानसभा क्षेत्र में आगामी 21 अक्टूबर को होने वाले पहले उपचुनाव में मिर्धा परिवार और मौजूदा कांग्रेस सरकार की प्रतिष्ठा दांव पर है।

सुरेश व्यास/खींवसर। नागौर जिले के खींवसर विधानसभा क्षेत्र में आगामी 21 अक्टूबर को होने वाले पहले उपचुनाव में मिर्धा परिवार और मौजूदा कांग्रेस सरकार की प्रतिष्ठा दांव पर है। आजादी के बाद से देश-प्रदेश की राजनीति में छाए रहे मिर्धा परिवार के वारिस पूर्व मंत्री हरेंद्र मिर्धा कांग्रेस प्रत्याशी हैं। उन्हें पिछले विधानसभा चुनाव से ऐन पहले बने क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (रालोपा) के प्रत्याशी नारायण बेनीवाल से कड़ा मुकाबला करना पड़ रहा है।


पुनर्सीमांकन मेंमूंडवा से तोडक़र बनाए गए खींवसर विधानसभा क्षेत्र में 2008 से अब तक मारवाड़ की राजनीति के नए क्षत्रप हनुमान बेनीवाल का दबदबा रहा है। वह यहां भाजपा, निर्दलीय व रालोपा प्रत्याशी के रूप में तीनों विधानसभा चुनाव जीते और अब सांसद हैं। क्षेत्र में पहली बार उप चुनाव हो रहा है। इलाके में हालांकि चुनावी शोरशराबा नहीं के बराबर है लेकिन उप चुनाव के नतीजों पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हैं। पिछले चुनाव में पहली बार दूसरे नम्बर पर रही कांग्रेस यह सीट हथियाने की कोशिश में है तो बेनीवाल का समर्थन कर रही भाजपा यहां की जीत के बहाने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सरकार को दबाव में लाने की कोशिश में जुटी है।

खींवसर का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां पार्टी से ज्यादा व्यक्ति पर मतदाता ज्यादा भरोसा करते हैं। फिर वोट काटने वाली कोई न कोई तीसरी ताकत हार या जीत का कारण बनती रही है। उपचुनाव में पहली बार आमने-सामने की टक्कर है। इसमें हरेंद्र प्रदेश में कांग्रेस की सरकार के साथ खुद के लगातार पंद्रह साल से चुनाव हारने के बाद संभावित सहानुभूति की लहर तो रालोपा प्रत्याशी नारायण पूरे इलाके में सांसद भाई हनुमान की सक्रियता के साथ भाजपा का वोट बैंक साथ जुडऩे के भरोसे चुनावी नैय्या पार लगने के अरमान पाल रहे हैं।

पहली बार सीधा मुकाबला
यहां अब तक हुए तीन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस तो अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई ही लड़ती रही। साल 2008 व २०१३ के चुनाव में बसपा के दुर्गसिंह ने मुकाबला त्रिकोणात्मक बना दिया। २०१८ के विधानसभा चुनाव में रालोपा, कांग्रेस व भाजपा में त्रिकोणात्मक मुकाबला हुआ। इस बार रालोपा-कांग्रेस में सीधी टक्कर है।

मुकाबला थळी और साळग का

जोधपुर-नागौर हाईवे पर बसा खींवसर विधानसभा क्षेत्र नागौर का दूसरा बड़ा इलाका है। स्थानीय भाषा में थळी और साळग नाम से पूरा क्षेत्र भौगोलिक रूप से दो हिस्सों में बंटता है। राजनीतिक रूप से भी दोनों इलाकों की प्रतिस्पर्धा ही हार-जीत का अंतर तय करती रही है। खींवसर के बायीं ओर का इलाका थळी कहलाता है तो दायीं ओर का इलाका साळग। इस बार भी लोग मु²ों की बजाय थळी-साळग की सियासी प्रतिस्पर्धा पर ज्यादा बात करते नजर आते हैं।

मुद्दे गौण, मतदाता मौन
उपचुनाव के दौरान मुद्दे गौण हैं, मतदाता मौन हैं। जोधपुर-नागौर हाईवे पर सोयला गांव के बाद से ही खींवसर का इलाका शुरू हो जाता है। कहीं भी चुनावी हलचल नजर नहीं आती। कुछ गाडिय़ों पर लगी दोनों प्रत्याशियों की पट्टियां जरूर चुनाव का आभास करवाती हैं। क्षेत्र के नागड़ी गांव में हथाई पर बैठे लोग चुनावी चर्चा से दूर ही नजर आए। गांव के युवा रामदेव जाट तो उलटे पूछने लगे कि आप बताओ हवा किसकी है? ज्यादा कुरेदने पर कहने लगे कि वोट तो इस बार आधे-आधे बंटेंगे। खींवसर के पदमसर चौराहे पर मिले बालाराम सारण ने कहा कि शुरुआत में जरूर मुकाबला एकतरफा दिख रहा था लेकिन अब नहीं। खींवसर के बाजार में पकौड़ी का ठेला लगाने वाले सुरेंद्र घांची बोले कि मुद्दे तो यहां आदमी देखकर वोट देते हैं। पांचला सिद्धा गांव में प्रख्यात संत जसनाथजी के आसन के सामने हथाई पर बैठे कुछ लोगों को कुरेदा तो बोले कि मुकाबला तो फिफ्टी-फिफ्टी का दिख रहा है। कैमिस्ट रामदयाल गौड़ बोले, यहां आज तक लोगों ने पार्टी की बजाय प्रत्याशी देखकर ही वोट दिया है। बुजुर्ग हुकमाराम जाट की राय में इस बार फैसला जरा मुश्किल होगा। पांचोड़ी गांव के बस स्टैंड पर नरपतसिंह कहने लगे कि दोनों प्रत्याशियों को लेकर बुजुर्गों और युवाओं की राय जुदा है। इसी गांव के बस्तीराम सैन बोले कि दोनों ही अच्छे प्रत्याशी हैं। ऐसे में फैसला मुश्किल हो रहा है। ताडावास, भावंडा, माणकपुर, गोवांकलां, मुंदियाड़, संखवास, खुडख़ुड़ा कलां, मेड़ास, पालड़ी आदि गांवों में न कहीं चुनावी शोर सुनाई दिया और न ही मुखर मतदाता।

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