पूनिया क्यों पहुंचे दिल्ली दरबार में

भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनियाBJP state president Satish Poonia ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी Prime Minister Narendra Modi से मुलाकात की। अध्यक्ष बनने के बाद यह उनकी पहली मुलाकात थी। इसे लेकर सियासी गलियारों में कई मायने निकाले जा रहे हैं। पूनिया भले ही यह कहें कि उन्होंने मोदी से मुलाकात का समय मांगा था और आज का समय तय हुआ था, लेकिन चर्चा यह है कि प्रदेश भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं चल रह रहा है। गुटबाजी इस कदर हावी है कि पहले विधानसभा उपचुनाव और उसके बाद अब निकाय चुनाव body electi

By: Prakash Kumawat

Published: 22 Nov 2019, 08:30 PM IST

जयपुर
भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनिया BJP state president Satish Poonia ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी Prime Minister Narendra Modi से मुलाकात की। अध्यक्ष बनने के बाद यह उनकी पहली मुलाकात थी। इसे लेकर सियासी गलियारों में कई मायने निकाले जा रहे हैं। पूनिया भले ही यह कहें कि उन्होंने मोदी से मुलाकात का समय मांगा था और आज का समय तय हुआ था, लेकिन चर्चा यह है कि प्रदेश भाजपा में सब कुछ ठीक नहीं चल रह रहा है। गुटबाजी इस कदर हावी है कि पहले विधानसभा उपचुनाव और उसके बाद अब निकाय चुनाव Body elections में जिस तरह से पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है उससे राष्ट्रीय नेतृत्व national leadership खुश नहीं है। संगठन चुनाव को लेकर भी कुछ नेताओं की शिकायत केन्द्र के पास पहुंची थी, जिसके चलते पूनिया दिल्ली दरबार में बुलाया गया गया।
बता दें कि निकाय चुनाव में प्रदेश भाजपा कहीं भी एकजुट होकर हमलावर के रूप में राज्य सरकार को घेरती नजर नहीं आई। जबकि विपक्षी दल होने के नाते भाजपा की प्रदेश इकाई को कांग्रेस सरकार के गलत कार्यों, बिगड़ी कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को लेकर जबरदस्त हमले बोलने चाहिए थे। प्रदेश के सभी जिलों में मौजूद विधायक और बड़े नेताओं की सक्रियता भी खास नजर नहीं आई।
निकाय चुनाव में स्थानीय मुद्दों को लेकर जिस तरह से माहौल को गर्माना चाहिए था, वैसा नहीं हुआ। ज्यादातर प्रदेश पदाधिकारी व विधायक जिलाध्यक्ष आदि चुनाव प्रचार में केन्द्र की मोदी सरकार के गुणगान करते नजर आए। उन्हें लग रहा था कि धारा 370 राममंदिर मुद्दे के निर्णय को लेकर जनता स्वत: भाजपा को वोट डाल देगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दूसरी तरफ कांग्रेस ने सरकार में रहते हुए विपक्षी दल भाजपा को घेरा जिससे सरकार की कमियों दब गई।
राजस्थान में भाजपा के एक खेमे विशेष के नेताओं की भूमिका भी इस चुनाव में खास नजर नहीं आई। सूत्रों के अनुसार खेमे विशेष के नेताओं की वजह से पार्टी को कई वार्डो में चुनाव इसलिए हारना पड़ा क्योंकि उनके समर्थक भी चुनाव मैदान में भाजपा प्रत्याशी के सामने खड़े थे, समझाइश के जरिए उन्हें पार्टी के प्रत्याशी के पक्ष में बिठाया जा सकता था। लेकिन बिठाने के ढंग से प्रयास करने बजाय अंदरखाने समर्थकों को चुनाव मैदान में हर हाल में डटे रहने निर्देश दिए गए थे।
यह भी बता दें कि राजस्थान में पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अरूण चतुर्वेदी के कार्यकाल में हुए संगठन चुनावों में धांधली को लेकर भाजपा दो खेमों में बंट गई थी और हालात ऐसे हुए कि वसुंधरा राजे, रामदास अग्रवाल, राजेन्द्र राठौड़ सरीखे नेताओं ने पहले प्रदेश मुख्यालय पहुंच कर इसका विरोध किया फिर राष्ट्रीय नेतृत्व तक शिकायत पहुंची। चूंकि राजस्थान में अभी भी संगठन चुनाव चल रहे हैं। सर्वसम्मति चुनाव संपन्न कराने के प्रयास चल रहे हैं, लेकिन कई मंडलों के सर्वसम्मति नहीं होने से चुनाव अटके पडें हैं। ऐसे में विरोध के स्वर ज्यादा मुखर न हो। इसके लिए क्या एहतियात बरते गए हैं और क्या उपाय और किए जाए इस मामले में भी मोदी—पूनिया में चर्चा हुई है।
जयपुर से पत्रिका टीवी के लिए प्रकाश कुमावत की रिपोर्ट

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