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इस खास अवसर पर माताएं रखेंगी व्रत, बच्चों के खिलौने भौंरा, बांटी की भी होगी पूजा, पढि़ए खबर…

- इस दिन महिलाएं सुबह से दातून कर भैस के दूध का चाय पीकर अपना व्रत करेंगी

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इस खास अवसर पर माताएं रखेंगी व्रत, बच्चों के खिलौने भौंरा, बांटी की भी होगी पूजा, पढि़ए खबर...

इस खास अवसर पर माताएं रखेंगी व्रत, बच्चों के खिलौने भौंरा, बांटी की भी होगी पूजा, पढि़ए खबर...

जांजगीर-चांपा. खमरछठ पर्व पर एक सितम्बर को महिलाएं व्रत रखकर अपने संतानों की रक्षा के लिए भगवान श्रीकृष्ण से मंगलकामना करेंगी। पर्व को लेकर बाजार में पूजा सामग्री की बिक्री शुरू हो गई है। पसहर चावल की कीमत इस बार बढ़ी हुई है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को संतान प्राप्ति, उनके दीर्घायु व सुखमय जीवन की कामना रखकर माताएं हलषष्ठी माता का व्रत रखेंगी। इस दिन महिलाएं सुबह से दातून कर भैस के दूध का चाय पीकर अपना व्रत करेंगी।

दोपहर के बाद घर के आंगन, मंदिर या गांव के चौपाल में तालाब बनाकर जल व जीवन का प्रतीक सगरी का निर्माण किया जाएगा। तालाब के पार में बेर, पलास, गूलर आदि पेड़ों की टहनियों तथा काशी के फूल लगाकर सजाते हुए गौरी-गणेश व कलश रखकर हलषष्ठी देवी की पूजा की जाएगी। साथ ही हलषष्ठी माता की छह कथाओं का श्रवण करते हुए अपने बच्चों के सौभाग्य की कामना करेंगी।

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आचार्यों ने बताया कि इस अवसर पर पूजन की सामग्री में पसहर चावल, महुआ के पत्ते, धान की लाई, भैंस के दूध, दही व घी का उपयोग किया जाता है। साथ ही बच्चों के खिलौनों भौंरा, बांटी, गेडी आदि भी रखकर उसकी पूजा की जाती है। पूजन के बाद व्रत करने वाली महिलाएं पसहर चावल की भात छह प्रकार की भाजी की सब्जी मुनगा, कद्दू, सेमी, तोरई, करेला, मिर्च, भंैस के दूध, दही व घी महुआ के पत्ते से बने दोना-पत्तल में प्रसाद के रूप में ग्रहण करती हैं। इस व्रत में छह की संख्या का विशेष महत्व रहता है। इसीलिए व्रत भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष का छठवां दिन, छह प्रकार की भाजी की सब्जी, छह प्रकार के खिलौनों का पूजन, छह प्रकार के अन्न वाले प्रसाद का वितरण
तथा छह कहानियों की कथा सुनी जाती है।

पोता मारकर आशीर्वाद
खमरछठ के दिन व्रती महिलाएं पूजन के बाद अपने संतान की पीठ व कमर के पास पोता मारकर उन्हें सुखद भविष्य का आशीर्वाद देंगी। पोता के लिए नए कपड़े के टुकड़े का उपयोग किया जाएगा। उसे हल्दी पानी से भिगाते हुए बच्चों के पीठ पर हल्की थपकी देकर माताएं अपने आंचल से पोंछेंगी। यही माता के द्वारा दिया गया रक्षा कवच का प्रतीक है। बच्चों को प्रसाद के रूप में लाई, महुआ आदि दिया जाएगा।

यह है कथा का सार
व्रत को लेकर पौराणिक कथा है कि वासुदेव देवकी के 6 बेटों को एक एक कर कंस ने कारागार में मार डाला था। जब सातवें बच्चे के जन्म का समय नजदीक आया तो देवर्षि नारद ने देवकी को हलषष्ठी देवी का व्रत रखने की सलाह दी। देवकी ने इस व्रत को सबसे पहले किया, जिसके प्रभाव से उनके आने वाले संतान की रक्षा हुई। सातवें संतान के रूप में बलराम तथा आठवें संतान के रूप में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने माता देवकी के गर्भ से जन्म लिया और हलषष्ठी माता की कृपा से उनकी कंस से रक्षा हुई। हलषष्ठी का पर्व भगवान कृष्ण व बलराम से संबंधित है। हल से कृषि कार्य किया जाता है, जो बलराम का प्रमुख हथियार भी है। यही वजह है कि हलषष्ठी व जन्माष्टमी एक दिन के अंतराल में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।

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