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‘यह शर्मनाक है, सरकारी अस्पताल में महिला चिकित्सक नहीं, पुरुष जीएनएम करवाते हैं प्रसव’

बाड़मेर जिले में गुढा मालाणी स्थित सीएचसी का मामला
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'It is embarrassing, not a female doctor in a government hospital

‘यह शर्मनाक है, सरकारी अस्पताल में महिला चिकित्सक नहीं, पुरुष जीएनएम करवाते हैं प्रसव’

जोधपु

राजस्थान हाईकोर्ट ने बाड़मेर जिले में गुढा मालानी कस्बे की सीएचसी पुरुष जीएनएम द्वारा महिलाओं के प्रसव करवाने को शर्मनाक बताया है। जस्टिस संदीप मेहता ने यह गंभीर मौखिक टिप्पणी चिकित्सा और स्वास्थ्य विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव की मौजूदगी में की।

जस्टिस मेहता ने यह टिप्पणी व याचिकाकर्ता कंपनी सीआरडी हेल्थ सेंटर की ओर से वर्ष २०१५ में सरकार के साथ एमओयू किया था जिसे मात्र दस माह बाद निरस्त कर दिया गया। कंपनी की ओर से एमओयू निरस्त करने को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी। कोर्ट ने सरकार को एमओयू रद्द करने के निर्णय पर पुनर्विचार करने के निर्देश भी दिए हैं।


सुनवाई के दौरान उजागर हुआ कि याचिकाकर्ता कंपनी ने सीएचसी में ४५ लाख की लागत से सुविधाएं क्रमोन्नत करने सहित समुचित स्टाफ लगाने व मात्र दस माह में चिकित्सकों द्वारा करीब ३० ऑपरेशन किए थे। सभी तरह की जांच भी सीएचसी में ही की जाती थी। जबकि सरकार की ओर से एमओयू निरस्त करने के बाद दो साल में गुडामालाणी की सीएचसी में अब तक कराए गए ऑपरेशन्स के बारे में पूछा गया तो पता चला कि वहां अभी तक एनेस्थिटिक चिकित्सक की पोस्टिंग नहीं होने से एक भी ऑपरेशन नहीं किया गाय। वहीं महिला रोगों व प्रसव आदि के लिए एक भी महिला चिकित्सक अथवा महिला एएनएम की पोस्टिंग भी नहीं की जा सकी।

इस पर जस्टिस मेहता ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह शर्मनाक है कि सरकारी अस्पताल में महिलाओं के प्रसव भी पुरूष जीएनएम द्वारा किए जाते हैं। एेसा लगता है कि कस्बे वालों को जो सुविधाएं मिल रही थी, उससे उनको वंचित कर दिया गया है। अत: सरकार याचिकाकर्ता के एमओयू को निरस्त करने के निर्णय पर पुनर्विचार करते हुए २७ सितम्बर तक पालना रिपोर्ट पेश करें।
मरीजों से शुल्क वसूलने की शिकायतें थीं

सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से एएजी पीआर सिंह के माध्यम से एसीएस वीनू गुप्ता ने पेश होकर कहा कि उक्त निजी कंपनी के बारे में कई शिकायतें आ रही थी, जिसमें मरीजों से पैसे वसूलने की भी शिकायतें शामिल थी। जब कि याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जेपी जोशी ने अपने सहयोगी सिद्धार्थ जोशी के माध्यम से कहा कि उनकी कंपनी के साथ सरकार ने २५ मई २०१५ को एमओयू किया, लेकिन कुछ दिनों बाद में ही उनके विरुद्ध एक जनहित याचिका दायर कर दी गयी, जिसमें कई आरोप लगाए गए।

उन्होंने कहा कि याचिका की सुनवाई में सरकार ने सीआरडी हैल्थकेयर द्वारा सराहनीय कार्य करने की रिपोर्ट दायर की थी। इस पर हाईकोर्ट ने २७ सितम्बर २०१६ को पीआईएल का निस्तारण कर दिया। लेकिन इसके बावजूद सरकार ने ३ अक्टूबर २०१६ को उनका एमओयू निरस्त कर दिया। उन्होंने कहा कि तब तक उन्होंने करीब ४५ लाख से अधिक का निवेश करते हुए कई चिकित्सकों व एएनएम आदि का स्टाफ नियुक्त किया तथा लैब आदि संचालि करना शुरू कर दी।