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आज भी रहस्य है किसने बनवाया मंडोर किला, मारवाड़ के राजवंशों के उत्थान-पतन का है मूक गवाह

सरदार संग्रहालय में रखा है मंडोर किले का पाषाण प्रवेश द्वार स्तंभ  

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मंडोर/जोधपुर. मारवाड़ की राजधानी मंडोर आज वह तपोवन नहीं रहा, जहां कभी रणबंका राठौड़ों के तेजस्वी चरित्र व गतिपूर्ण विजयों के इतिहास से कई पृष्ठ निबद्ध हुए थे। इस मंडोर किले को पाने के लिए जोधपुर नगर के संस्थापक राव जोधा लंबे अरसे तक जंगलों में भटकते रहे, वही किला अब लावारिस अवस्था में है।


केंद्र सरकार के आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) के अधीन मंडोर किले के साथ राजस्थान पुरातत्व विभाग, उद्यान विभाग व पीडब्ल्यूडी जुडऩे के बावजूद किला लावारिस हालत में है। एएसआई के करीब सौ पदों में से 55 पद रिक्त होने के कारण मंडोर में कोई कर्मचारी व अधिकारी तैनात नहीं है। मंडोर किले के प्रबंधन और देखभाल करने वाले आर्कियोलोजिकल सर्वे आफ इंडिया का मुख्यालय भी वर्तमान में पाली रोड स्थित आफरी परिसर में संचालित हो रहा है। अधिकारियों ने बताया कि पूर्व में विभाग का मुख्यालय मंडोर में एक निजी भवन में किराये पर संचालित किया गया, लेकिन शीर्ष अधिकारियों के आदेश से मुख्यालय को आफरी में शिफ्ट किया गया।

एएसआई जोधपुर सर्किल के अधीन अजमेर , बांसवाड़ा, बीकानेर , चित्तौडगढ़़, डूंगरपुर, गंगानगर, हनुमानगढ़, जैसलमेर , जोधपुर, राजसमंद व उदयपुर के कुल 73 ऐतिहासिक स्मारकों की देखरेख और मरम्मत का जिम्मा है। जोधपुर में एकमात्र मंडोर किला ही विभाग के अधीन है। कुंभलगढ़, चित्तौडगढ़़ और जैसलमेर फोर्ट में सर्वाधिक पर्यटकों की आवक के कारण विभाग मंडोर किले की ओर से ध्यान नहीं दे रहा है। दो दशक से खुदाई का काम अटका पड़ा है। मंडोर किला देखने आने वाले पर्यटकों के लिए शौचालय तक की व्यवस्था अभी तक नहीं हो पाई है। यदि विभाग किले की नए सिरे से खुदाई शुरू करवाए तो इतिहास के कई पन्ने खुल सकते हैं।

इनका कहना है


विभाग की ओर से मंडोर किले की दीवार को चरणबद्ध तरीके से संरक्षित करने की शुरुआत हो चुकी है। किले के पास जमीन हरी-भरी करने के लिए प्रचुर मात्रा में पानी उकी पलब्धता देखते हुए इसे हरा भरा किया जाएगा। वर्तमान में हमारे अधीन संरक्षित स्मारकों की सुरक्षा के लिए स्टाफ की कमी है।

डॉ. वीएस बडिग़ेर, अधीक्षण पुरातत्वविद, आर्कियोलोजिक सर्वे ऑफ इंडिया