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नहीं मिल रहे ऊन के भाव, संकट में भेड़पालन

सरकार द्वारा भेड़पालन को प्रोत्साहन के अभाव में ऊन के वाजिब दाम नहीं मिल पा रहे है। इससे पशुपालकों की आर्थिक दशा चरमराई हुई है।  
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नहीं मिल रहे ऊन के भाव, संकट में भेड़पालन

नहीं मिल रहे ऊन के भाव, संकट में भेड़पालन

बेलवा (जोधपुर). पुराने समय में रेगिस्तान के ग्रामीण अंचल के गांव में प्रवेश करते थे तो भोर में या ढलती शाम को टन टन घंटियों का एक मधुर स्वर सुनाई देता था। ये घंटिया गांवों में भेड़ों के प्रस्थान या आगमन का संदेश देती थी।

जब शांत वातावरण में दूर से पता चल जाता कि गडरियां भेड़ों के साथ आ रहा है। लेकिन ये दृश्य बस अतीत बनकर रह गया है। क्योंकि भेड़पालन के व्यवसाय पर संकट के बादल मंडराए हुए है। सरकार द्वारा भेड़पालन को प्रोत्साहन के अभाव में ऊन के वाजिब दाम नहीं मिल पा रहे है। इससे पशुपालकों की आर्थिक दशा चरमराई हुई है।

पशुपालक बताते है कि पुराने जमाने के गाय के देशी घी के बराबर ऊन के दाम हुआ करते थे। लेकिन वर्तमान में भेड़ की ऊन मजबूरन महज 30 से 40 रुपए प्रतिकिलो की दर से बेचनी पड़ रही है। ऐसे में पशुपालकों को आर्थिक रूप से नुकसान हो रहा है। सरकार एक तरफ भेड़पालन को बढावा देने को लेकर पशुपालकों के हित में योजनाओं को लागु करने के दावे कर रही है। लेकिन जागरूकता के अभाव में धरातल पर उनका असर नहीं दिख रहा है।

घटा ऊन का व्यापार

पशुपालक बताते है कि पुराने समय में जहां बड़ी संख्या में ऊन खरीदार आते थे। लेकिन अब गांवों में भेड़ की ऊन को बेचने के लिए संभावनाएं नहीं बची है। कृत्रिम रेशों के अत्यधिक चलन से ऊन की मांग घटी है। ऐसे में पशुपालक स्थानीय व्यापारियों को कम दामों पर ऊ न बेच रहे है। घट रहे जंगलों के बीच भेड़ों के लिए प्रर्याप्त चारा जुटाना भी मुश्किल हो रहा है। आर्थिक संकट से जुझते हुए गांवों के पशुपालक भेड़पालन से मुंहमोड़ रहे है। राज्य में भेड़ की नस्लें चोकला, मारवाड़ी, पाटनवाड़ी, मालपुरा, सोनाड़ी, जैसलमेरी, मगरा, नाली एवं पूगल प्रमुख है।

इनका कहना है

भविष्य में भेड़पालन को बचाना किसी चुनौती से कम नहीं होगा। राज्य सरकार ऊन ब्रिकी को प्रोत्साहन दर के रूप में सरकारी मूल्य से पशुपालकों के हित में काम करें तो भेड़पालन व्यवसाय को बढावा मिल सकेगा। पशुपालकों को भेड़पालन से जोडऩे के साथ ही प्रशिक्षण की दरकार है। तब ही इसे सरंक्षण मिल सकेगा।

मोहनसिंह,पशुपालक।

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