Independence Day 2018- छत्ता सिंह के चलते देश का सीना हुआ था चौड़ा, ब्रिटिश सरकार ने विक्टोरिया क्रास देकर नवाजा

Vinod Nigam | Publish: Aug, 14 2018 01:58:38 PM (IST) Kanpur, Uttar Pradesh, India

भोपाल इन्फ्रेण्टी ब्रिटिश इण्डिया आर्मी में नायक थे, प्रथम युद्ध में लिया था भाग, बदहाली का जीवन जर रहा परिवार

कानपुर। देश की आजादी का बिगुल पांडेय ने फूंका, जिसकी आग से बिठूर से ज्वाला धंधक उठी। नानाराव पेशव व तात्या टोपे ने यहां के 1857 को अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया। इस दौरान सैकड़ों सपूत मां भारती के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पद हम हम एक ऐसे रणबांकुरे का जिक्र करने जा रहे हैं जिसकी बहादुरी के किस्से 104 साल बीत जाने के बाद आज भी लंदन की गलियों में सुनाई देते हैं। जी हां ये कोई और नहीं, बल्कि कानपुर जिले के घाटमपुर तहसील के तिलसड़ा गांव निवासी हललदार दत्ता सिंह हैं। छत्ता सिंह ने प्रथम विश्व यु़द्ध के दौरान विरोधी सेनाओं के पसीने छुडा दिए थे। इसी के चलते उस वक्त की अंगेज सरकार ने इन्हें सर्वोच्च वीरता पुरस्कार विक्टोरिया क्रास से नवाजा था। लेकिन दुख की बात यह है कि इस बहादुर सैनिक को सरकार के साथ कनपुर के लोग भी भूल गए हैं। इस हवलदार का गांव बदहाल है परिवार दिहाड़ी मजदूरी कर पेट पालने को विवश है। अखिलेश सरकार के दौरान गांव में स्मारक के लिए धन दिया गया, लेकिन तीन साल से सिर्फ वहां सिर्फ एक प्रति ही लग पाई है।

दुश्मनों पर भारी पड़े थे छत्ता सिंह
तिलसड़ा गांव निवासी हवलदार छत्ता सिंह, यह नाम कानपुर में जन्में उस बहादुर राजपूत का है जिसपर किसी भी भारतीय को गर्व हो सकता है। छत्ता सिंह को प्रथम विश्व युद्ध में शौर्य प्रदर्शन के लिये उस वक्त के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार विक्टोरिया क्रास से नवाजा गया था। लेकिन इस बहादुर हवलदार का परिवार बदहाली का जीवन जीने को विवश है। छत्ता सिंह के पौत्र नागेन्द्र सिंह ने बताया कि बिट्रिस सरकार ने उनके दादा जी को वीरता के पदक से नवाजा, लेकिन भारत सरकार ने आज तक हमारे लिए कुछ नहीं किया। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एकबार जरूर हमें दिल्ली बुलाया था और परिवार के एक सदस्य को सेना में नौकरी दिलाने की बात कही थी, कि लेकिन वो कुछ कर पातीं उससे पहले ही उनकी मौत हो गई।

इसके चलते मिला विक्टोरिया क्रास
1914 में प्रथम विश्व युद्ध छिड़ा था। ब्रिटिश हुकूमत ने लगभग बारह लाख सैनिक कई देशों में भेजे थे। तब छत्ता सिंह नवीं भोपाल इन्फ्रेण्टी ब्रिटिश इण्डिया आर्मी में नायक थे। 29 साल की उम्र में वे ईराक के मोर्चे पर भेजे गये। 13 जनवरी 1916 को भारी फायरिंग के बीच उन्होने अपनी जान की परवाह किये बिना अपने घायल कमाण्डिंग ऑफीसर को पॉच घण्टे तक कवर किया और उनकी जान बचा ली। इस अदम्य साहस के लिये ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें विक्टोरिया क्रास से नवाजा। इस युद्ध में छत्ता सिंह ने विरोधी सेना के सैकड़ों जवानों को अकेले मौत के घाट उतरा था। इसके बाद छत्ता सिंह कई लड़ाईयों में भाग लिया।

इंदिरा गांधी ने पदक देकर किया था वादा
छत्ता सिंह के पौ नागेंद्र सिंह बताया कि, 1947 में मुल्क आजाद हो गया। पच्चीस साल बाद जब देश ने आजादी की रजत जयन्ती मनायी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने हमारे दादा को दिल्ली बुलवाया। उन्होने इस मौके पर दादा जी को संग्राम मेडल प्रदान किया। यह एक वीरोचित सम्मान था। बताते हैं, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने गांव के विकास के लिए यूपी सरकार को पत्र भी लिखा था और हमारे परिवार को नौकरी देने की बात कही थी। लेकिन सूबे की कई सरकारों ने इस पर गौर नहीं किया। भारत की सरकार तो छत्ता सिंह को भूल चुकी थी लेकिन ब्रटिश सरकार अपने वीर सैनिक को याद कर उसके गावं पर उनका भव्य स्मारक बनाने के लिए प्रयासरत है।

विक्टोरिया क्रास लाने का करें प्रयास
छत्ता सिंह के स्मारक की नींव रखे जाने से पहले एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। विकीपीडिया पर मौजूद जानकारी के मुताबिक यह विक्टोरिया क्रास लन्दन में नीलाम हो चुका है। छत्ता सिंह की बेटी रमा सिंह एक बार सिंगापुर गयी थीं। वहॉ एअरपोर्ट पर चेंकिंग के दौरान विक्टोरिया क्रास निकलवा लिया गया। बाद में निजी नीलामकर्ताओं ने 22 सितम्बर 2006 को इस विक्टोरिया क्रास को 520 पाउण्ड यानि लगभग इक्यावन हजार रूपये में नीलाम कर दिया। छत्त सिंह के पौत्र नगें्रद सिंह ने कहा कि अगर ब्रिटेन सरकार सौ साल बाद एक भारतीय योद्धा की स्मृतियॉ सहेजने के लिये पहल कर सकती है तो पीएम मोदी और योगी सरकार को भी चाहिये कि वो विक्टोरिया क्रास को भारत वापस लाने के लिये प्रयास करे।

प्रतिमा को कपड़े से ढका गया
छत्ता सिंह के पौत्र ने बताया कि यूपी में योगी सरकार बनने के लिए दादा जी का स्मारक व प्रतिमा के निर्माण कार्य में तेजी आई। प्रतिमा बनकर तैयार हो गई, पर आगे का काम नहीं हो सका। डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या ने 25 अक्टूबर 2017 को गांव आना था और स्माकर का लोकापर्ण करना था। जिसके चलते अधिकारियो के द्वारा गांव में साफ सफाई शुरू कराई गई। कई आलाधिकारियों ने मौके पर पहुंच कर निरीक्षण किया, लेकिन जब उन्हें पता चला कि यहां सिर्फ काम के नाम पर खानापूर्ति की गई है तो उन्होंने डिप्टी सीएम को यहां के बारे में जानकारी दी और जनवरी में लोकापर्ण का वक्त मांगा। बावजूद आठ माह बीत गए, लेकिन स्मारक में एक पैसे का कार्य नहीं हुआ।

Ad Block is Banned