टीबी की दवा का सही डोज हालत में तेजी से करेगा सुधार

मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य के शोध ने इलाज को दी नई दिशा
डब्ल्यूएचयू की सिफारिश पर दुनिया ने नई डोज को किया स्वीकार

कानपुर। टीबी से पीडि़त मरीजों के लिए अच्छी खबर है। अब उन्हें बीमारी से जल्द राहत मिलेगी। टीबी की दवा का सही डोज से उन्हें इस बीमारी से लडऩे में मदद करेगा। इसके लिए कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्राचार्य और चेस्ट हेड रहे डॉ. एसके कटियार का शोध काम आया। उन्होंने कई साल के शोध के बाद टीबी मरीजों पर दवा के डोज का निर्धारण कर बड़ी राहत दी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचयू) की सिफारिश पर पूरी दुनिया ने एमडीआर टीबी की नई डोज को स्वीकार कर लिया है। उन्होंने पूरी दुनिया को टीबी बीमारी के इलाज की नई गाइड लाइन दी है।

पुराना डोज नहीं था कारगर
अभी तक टीबी के मरीजों को आइसोनियाजिड दवा 5 एमजी प्रति किलो (मरीज के वजन) के हिसाब से दी जाती थी। इस डोज से बीमारी का लंबे समय तक उपचार चलता था और दवा काफी हद तक कारगर नहीं हो पा रही थी। यही डोज दुनिया भर में टीबी के मरीजों को दिया जाता है, जिस कारण टीबी का मरीज लंबे समय तक बीमारी से जूझता रहता है।

बढ़े हुए डोज ने दिखाया असर
टीबी के मरीजों पर पुराने डोज की दवा कारगर नहीं हो रही थी तो डॉ. कटियार ने उसकी डोज 5 एमजी से बढ़ाकर 10 एमजी कर दी। इसके अच्छे परिणाम आने लगे। उनका यह प्रयोग करीब दस वर्ष तक चला। जब इस डोज से टीबी मरीजों का मुकम्मल इलाज होने लगा तो उन्होंने इस शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दावा किया। डॉ. कटियार के शोध पत्र को इंटरनेशनल जर्नल ऑफ ट्यूबरक्लोसिस एंड लंग्स डिसीज ने प्रकाशित किया तो पूरी दुनिया ने इसे मान्यता दी। डब्ल्यूएचओ ने अप्रैल 2019 में टीबी की नई डोज स्वीकार करने की सिफारिश की।

आलोक पाण्डेय
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