कोरोनाकाल में पतंगबाजी चढ़ी है परवान पर, कोरोना की मार से अछूता है यह धंधा

कोरोनाकाल में पतंगबाजी चढ़ी है परवान पर, कोरोना की मार से अछूता है यह धंधा

करौली। कोरोना महामारी की मार से कोई भी धंधा अछूता नहीं रहा है। कमोवेश सभी व्यवसायों पर इसका विपरीत असर दिखा है । इसके विपरीत पतंग व्यवसाय ऐसा है जो इस वर्ष कोरोना के दौर में परवान पर चढ़ा है। गौरतलब है कि करौली इलाके में रक्षाबंधन और कृष्ण जन्माष्टमी पर पतंग उड़ाने की परम्परा रियासत काल से प्रचलित है। इस बार पतंगों के सीजन ने कोरोना के कारण रफ्तार पकड़ी हुई है।

By: Surendra

Published: 02 Aug 2020, 07:46 PM IST



बीते वर्षो से व्यवसाय में तीन गुना तक इजाफा
बच्चे छुट्टी के कारण खूब उड़ा रहे पतंग
करौली। कोरोना महामारी की मार से कोई भी धंधा अछूता नहीं रहा है। कमोवेश सभी व्यवसायों पर इसका विपरीत असर दिखा है । इसके विपरीत पतंग व्यवसाय ऐसा है जो इस वर्ष कोरोना के दौर में परवान पर चढ़ा है। गौरतलब है कि करौली में मई महीने से पतंग उड़ाने का सीजन शुरू हो जाता है। करौली इलाके में रक्षाबंधन और कृष्ण जन्माष्टमी पर पतंग उड़ाने की परम्परा रियासत काल से प्रचलित है। इस बार पतंगों के सीजन ने कोरोना के कारण खासी रफ्तार पकड़ी हुई है।
पतंग बिक्रेता विष्णु गुप्ता का कहना है कोरोना के कारण स्कूल बंद हैं । बच्चों को होमवर्क भी नहीं मिल रहा है। ऐसे में पतंग का सीजन अन्य वर्षो के मुकाबले में अच्छा चल रहा है। बच्चे सुबह से शाम तक पतंगों को उड़ाने का आनंद लेते हैं। पहले स्कूल जाने के कारण वे शाम के समय ही पतंग उड़ा पाते थे। बाजार जल्दी बंद होने से अधिकांश लोग घरों में ही रहते हैं तो वे बच्चों के साथ छत पर पतंगों का मजा लेते हैं। इस स्थिति में पतंगों की बिक्री में तीन गुना तक इजाफा हुआ है।
२५ साल में पहली बार मिली धंधे को हवा
बीते २५ वर्ष से पतंगों का धंधा कर रहे विष्णु गुप्ता के अनुसार उनकी याद में पहली बार पतंगों का सीजन परवान पर पहुंचा है। इस बार सुस्ताने को भी फुरसत नहीं मिल रही है। विष्णु बताते हैं कि राखी और जन्माष्टमी के दिनों में २० से २५ हजार की बिक्री हो पाती थी। जबकि कोरोना की महामारी के चलते रोजाना ६० से ७० हजार की बिक्री हो रही है। पिछले साल के मुकाबले में पतंगों, मांजा व डोर की कीमतों में इजाफा हुआ है। फिर भी बिक्री में कमी नहीं आई है। करौली में ५० से अधिक दुकानें पतंगों की है। सब पर इन दिनों खासी भीड़ दिखती है।
चीन का मांजा गायब
भारत के साथ चीन के रिश्तों में आई खटास के कारण बाजार से इस बार चीन का मांजा गायब है। पतंग बिक्रेता इस्लामुद्दीन दफेदार बताता है कि बच्चे भी अब इतने समझदार हो चुके कि वे चीन के मांजे की मांग भी नहीं करते हैं। चीन का मांजा मजबूत और धारदार माना जाता है लेकिन पक्षियों के लिए और बच्चों के लिए खतरनाक भी रहता है। सरकार इसको प्रतिबंधित करती रही है लेकिन इस बार चीन से बिगड़े रिश्तों के कारण यह बाजार से स्वत: गायब
हुआ है। मांजे की चरखी की कीमत में १०० से १२५ रुपए का इजाफा इस साल में हुआ है।
मोदी और शाह भी उड़ रहे हवा में
यूं तो बाजार में विभिन्न प्रकार की रंग-बिरंगी पतंगें उपलब्ध हैं लेकिन नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, छोटू,मोटू तथा अभिनेता व अभिनेत्री के चेहरों वाली पतंगें भी बाजार में बिक रही हैं। सबसे सस्ती पतंग २ रुपए की है जबकि महंगी पतंग ५० रुपए तक की उपलब्ध है। औसत बिक्री ८-१० रुपए वाली पतंगों की होती है। वैसे ज्यादातर मांग देशी पतंगों यानी करौली में तैयार की हुई पतंगों की है। यह पतंग तेज हवा और ऊचाई पर पहुंचने पर भी संतुलित बनी रहती है। इनकी कीमत अधिक होने के बावजूद लोग देशी पतंग अधिक मांगते हैं। इस बार स्थिति ऐसी बनी है कि रक्षाबंधन से पहले ही बाजार से देशी पतंग गायब हुई हैं। यानी मांग अधिक होने से इनकी कमी आ गई है।

Surendra Bureau Incharge
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