एक शिक्षक की गौसेवा की अनूठी बानगी: डांग क्षेत्र में चलती है अपाहिज गायों की गौशाला

एक शिक्षक की गौसेवा की अनूठी बानगी: डांग क्षेत्र में चलती है अपाहिज गायों की गौशाला
करौली . जिले के मण्डरायल कस्बे के समीप खांडेका पुरा गांव में अपाहिज गायों की गौशाला संचालित है। यह गांव डांग क्षेत्र में आता है जिसकी पहचान अमूमन डकैतों की वारदात में होती है लेकिन इस अनूठे काम से डांग की प्रसिद्घि धर्म के रूप में भी हो रही है।
शहर, कस्बों-गांवों में गौशालाओं का संचालन तो खूब होता है लेकिन केवल विकलांग गायों के लिए संचालित यह गौशाला अनूठी है। इसमें केवल अपाहिज या वृद्ध गाय ही रहती हैं।

By: Surendra

Updated: 07 Jul 2020, 10:51 AM IST

एक शिक्षक की गौसेवा की अनूठी बानगी:
डांग क्षेत्र में चलती है अपाहिज गायों की गौशाला
सुरेन्द्र चतुर्वेदी
करौली . जिले के मण्डरायल कस्बे के समीप खांडेका पुरा गांव में अपाहिज गायों की गौशाला संचालित है। यह गांव डांग क्षेत्र में आता है जिसकी पहचान अमूमन डकैतों की वारदात के रूप में होती है लेकिन इस अनूठे काम से डांग की प्रसिद्घि धर्म के रूप में भी हो रही है।
शहर, कस्बों-गांवों में गौशालाओं का संचालन तो खूब होता है लेकिन केवल विकलांग गायों के लिए संचालित यह गौशाला अनूठी है। खास बात यह है कि इसमें केवल अपाहिज या वृद्ध गाय ही रहती हैं। इनमें से कुछ उपचार से स्वस्थ्य हो जाती हैं तो उनको गौशाला भेज दिया जाता है। पूरी तरह से गौसेवा धर्म के आधार पर यह गौशाला संचालित हो रही है।
मण्डरायल कस्बे के समीप खांडेकापुरा गांव में यह गौशाला वर्ष 2003 में शिक्षक गिर्राज प्रसाद मीना उर्फ हरिओम ने मात्र दो विकलांग गायों की सेवा करते हुए अपने खेत में शुरू की। गिर्राज मीणा का यह खेत ही अब विकलांग गौशाला के रूप में उपयोग आ रहा है। हालांकि अपाहिज गायों की संख्या 80 से अधिक हो गई है। ऐसे में गौशाला के लिए गिर्राज द्वारा निर्धारित की गई दो बीघा जमीन अब कम पडऩे लगी है। गौशाला के लिए 5 बीघा भूमि कुछ वर्षो पहले आवंटित कर दी गई, जो बाद में झमेलों में उलझ गई।
शुरू में तो गौशाला में गायों की संख्या सीमित ही रही। ऐसे में शिक्षक गिर्राज और उसके परिवार के सदस्य विकलांग गायों की संभाल कर लिया करते थे और खर्च भी उठाते थे। वर्ष 2012 से इस गौशाला का प्रचार बढ़ा तो यहां गायों की संख्या 20 तक हो गई। साथ ही लोग मदद को आगे
आने लगे।
गायों की संख्या बढऩे से गिर्राज अपने गौसेवा के कर्तव्य से डिगे नहीं बल्कि उनका उत्साह बढ़ गया। इसके बाद जहां भी उनको विकलांग गाय की सूचना मिलती है वो अपने खर्चे पर वाहन का प्रबंध करके उसे गौशाला लाकर सेवा करने लगते हैं। इलाके में प्रचार होने के बाद अब सभी लोग खुद अपाहिज गायों को यहां छोड़ जाते हैं। इसके बाद कम्पाउण्डर को लाना और उसका उपचार शुरू करना गिर्राज का काम होता है।
वे दो वर्ष पहले तक पूरी तरह से अपने खर्चे से इसका संचालन करते रहे। इसके बाद इस गौशाला के लिए समिति गठित हो गई। मंडरायल ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष पंडित वासुदेव शुक्ला गौशाला समिति में संरक्षक के रूप में सेवाएं दे रहे हैं। गिर्राज बताते हैं कि अब तीन चौथाई खर्चा दानदाताओं से मिल जाता है। शेष खर्च वह स्वयं तथा मंडरायल के पूर्व सरपंच राजू सिंह उठाते हैं।
वैसे मण्डरायल के लोग विभिन्न मौके पर इस गौशाला के लिए हर सम्भव दान- पुण्य करने लगे हैं। जयपुर में रहने वाले गोपाल शर्मा ने गायों के लिए चारा पैदा करने को अपना खेत दे रखा है। अन्य लोग भी मदद को आगे आ गए हैं। इतने पर भी गायों की सेवा के लिए समर्पित भाव से समय तो गिर्राज और उनका परिवार ही देता है। नि:शक्त गायों की सेवा करना हर किसी के बूते की बात नहीं। गौशाला में 50 प्रतिशत गाय तो अंधी हैं। अनेक गायों के जख्म हो रहे होते हैं, उनमें कीड़े पड़ जाते हैं। ऐसे जख्मों की सफाई करके मरहम पट्टी करना सहज नहीं होता। गिर्राज की पत्नी हृदय रोग से पीडि़त है लेकिन वह भी पूरे मनोयोग से पति के साथ गौ सेवा में जुटी रहती है। गौशाला में गायों के लिए पानी के लिए बोरिंग और उनको गर्मी न सताए इसके लिए पंखे लगाए हुए हैं।
लोगों से सुनकर पूर्व मंत्री अरुण चतुर्वेदी, तत्कालीन जिला कलक्टर डॉ. मोहनलाल यादव तथा पुलिस अधीक्षक अनिल बेनीवाल भी इस गौशाला को देखने पहुंचे तो गायों की सेवा को देख अभिभूत हो गए। लोगों ने कलक्टर से गौशाला के लिए भूमि आवंटन की मांग की जिससे इसका और विस्तार किया जा सके।

Surendra Bureau Incharge
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