इत्र के शौक ने बदल दी जिंदगी

बीकानेर से शुरू हुई यात्रा ने कोलकाता पहुंचकर नया मोड़ ले लिया। यह यात्रा जिंदगी की थी तो कुछ कर गुजरने की भी। सिटी ऑफ जॉय में 68 साल की अवधि बिताने के बाद भी ऐसा लगता है मानो कल ही की बात हो। जब यहां आए तो मामा का घर एकमात्र ठिकाना था। उनके पास रहकर धीरे-धीरे पान मसाले का कारोबार शुरू किया। उसमें अलग-अलग तरह के इत्र मिलाने पर कामयाबी मिलने लगी। फिर इत्र संग्रहण का शौक लग गया और एक अलग ही यात्रा शुरू हो गई, जो उम्र के 80 बसंत पार करने के बाद भी बरकरार है। वे राजस्थान से निकले भले अकेले थे।

शख्सियत: गोपाल दास डागा के पास है कई पुराने इत्र का संग्रह

- 12 वर्ष की वय में अकेले चले आए थे कोलकाता
- आज 80 साल की उम्र में भी पहचान लेते हैं हर तरह के इत्र की महक

दीनदयाल
कोलकाता. हर कोई खुशबू के बीच रहना चाहता है और इसका सबसे बड़ा जरिया है इत्र। आज बाजार में केमिकल युक्त इत्र ही बहुतायत में मिलते हैं। असली इत्र मिलना बहुत मुश्किल है क्योंकि ये या तो बहुत ही महंगे हैं या दुर्लभ। यह कहना है इत्र विशेषज्ञ कोलकाता के प्रवासी राजस्थानी गोपालदास डागा का। उनके पास पुराने इत्र संग्रहीत हैं, जो आज गिनेचुने लोगों के पास ही मिलते हैं। जीवन का इतना बड़ा हिस्सा इत्र के बीच गुजार देने के बाद उनके लिए सुगंध से यह पहचान कर लेना आसान है कि कौनसा इत्र असली है, कौनसा केमिकल युक्त। आइए उनसे हुई बाचीत के आधार पर जानते हैं इत्र की खसियत के बारे में।
ठाकुरजी के नहीं चढ़ाते 'हिना'
डागा दावे से कहते हैं कि आज अधिकांश इत्र बनावटी मिलते हैं। प्राकृतिक इत्र नहीं मिलता। क्योंकि इनकी कीमती अधिक होती है। मुख्य इत्र कस्तूरी, अगर, गुलाब, हिना, बेला, चंपा, कस्तूरी, केवड़ा, चमेली आदि होते हैं। लेकिन हिना ऐसा इत्र है जो ठाकुरजी के नहीं चढ़ाया जाता। क्योंकि इसमें कई वर्जित मसाले मिश्रित होते हैं।
काफी महंगा है 'अगर'
डागा का कहना है कि 'अगर' का इत्र दुर्लभ और काफी महंगा है क्योंकि 'अगर' के पेड़ कम होते जा रहे हैं। 'अगर' के मिलने की संभावना बहुत कम रहती है। कई व्यवसायी इसके नाम पर कम्पाउंड इत्र बेच देते हैं।
असम में आज भी है 'कस्तूरी'
उनका कहना है कि कस्तूरी के साथ भी ऐसा ही है। कस्तूरी भी खत्म हो रही है। हालांकि असम में आज भी कस्तूरी है लेकिन पहले के मुकाबले बहुत कम।
धीरे-धीरे खत्म हो रहा 'केवड़ा'
वे कहते है कि कभी केवड़ा इत्र का प्रचलन बहुतायत में था लेकिन धीरे-धीरे यह भी खत्म हो रहा है। आज केवड़े के असली इत्र का भाव करीब 5 लाख रुपए प्रति किलो होगा।
मिलावट से अछूता नहीं 'गुलाब'
डागा का कहना है कि गुलाब का इत्र सर्वाधिक उपयोग में आता है लेकिन यह भी मिलावट से अछूता नहीं। न तो गुलाब जल ही प्राकृतिक है, न ही इसका इत्र। सुहानी सुगंध के कारण अधिकतर लोग इसे खरीदते हैं।
कहीं नहीं भारत जैसा 'चंदन'
गोपालदास का कहना है कि भारत में आज चंदन की लकड़ी कोई हाथ में लेकर नहीं चल सकता क्योंकि यह अपराध की श्रेणी में आता है। एक लाख रुपए प्रति किलो में केरल के कोझिकोड अथवा कालीकट से चंदन का तेल आता है। चंदन अफ्रीका से भी आता है लेकिन भारत जैसा चंदन दुनिया में कहीं नहीं। यह कर्नाटक के जंगलों में पाया जाता है।
विदेश से आता है प्राकृतिक 'केसर'
उनका कहना है कि भारत के सीमित क्षेत्र में ही केसर की पैदावार होने के कारण यह विदेश से आती है। केसर इत्र ग्लिसरिन बेस पर तैयार किया जा रहा है। पान मसाले में इसका बहुत उपयोग होता है।
कई इत्र मिलाकर तैयार होता था 'मजमुआ'
डागा बताते हैं कि पुराने लोग मजमुआ खोजते थे। इसे गुलाब, बेला, चमेली, खस, हिना इत्र मिलाकर बनाया जाता था। अब असली मजमुआ नहीं मिलता।
अब नहीं रहे इत्र के पारखी
डागा के अनुसार आज भले प्राकृतिक इत्र के पारखी नहीं रहे लेकिन इत्र का व्यापार लगातार बढ़ रहा है। बाजार में बहुत से सिंथेटिक पर यूम आ रहे हैं जो केमिकल से बनते हैं। यह शरीर के लिए घातक हैं। असली इत्र फूलों को उबालकर भाप के रूप में तैयार करते हैं। वहीं भपका देकर इत्र की रूह तैयार की जाती है। अब तो हाल यह है कि श्रीनाथजी की नगरी नाथद्वारा में भी असली इत्र नहीं मिलता।
ऐसे आगे बढ़ा कारवां
गोपाल दास बताते हैं कि बीकानेर में नृसिंह मंदिर के पास घर था। परिवार में पिता रामकिशन डागा और मां जडिय़ा देवी, तीन बहनें और सात भाई थे। 12 साल के थे तभी एक दिन बक्सा उठाकर कलकत्ता के लिए रेलवे स्टेशन पहुंच गए। जेब में 10 रुपए थे और 10 रुपए मां से लिए। कलकत्ता के लिए 17 रुपए में हाफ टिकट कटवा लिया। तीन रुपए बचे, जिससे ट्रेन में 3 दिन निकालने थे। ट्रेन में एक सज्जन मिले जो मुझे ठेठ तक खिलाते-पिलाते लेकर आए। कलकत्ता में रिक्शावाले को चव्वन्नी देकर मामा के पास चले आए। धीरे-धीरे पान मसाले का व्यवसाय शुरू किया। सात साल बाद दादी से मिलने बीकानेर गया और 6 महीने उनकी सेवा कर वापस कलकत्ता आकर व्यवसाय को जमाया। फिर पूरा परिवार यहीं आ गया। बीकानेर में आज भी पुश्तैनी घर है।
राजस्थानी संस्कृति से जुड़ाव
कोलकाता में इतनी अवधि गुजारने के बावजूद डागा का राजस्थानी संस्कृति से जुड़ाव है। परिवार संयुक्त हैं और सभी राजस्थानी भाषा ही बोलते हैं। पहनावा भी राजस्थानी ही है। उनके चार बेटे और एक बेटी की शादी भी कोलकाता में ही की। बेटे सफल व्यवसायी हैं।

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Rajendra Vyas Editorial Incharge
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