रावतभाटा. घर में लड़की पैदा हुई तो पिता मायूस हो गए, क्योंकि मेरे से पहले दो बहनें और भी हैं। तीसरी लड़की जन्मी तो पिता इतने नाराज हुए कि उन्होंने मेरा नाम ही 'नाराज' रख दिया। लेकिन, मैं अपने पीछे एक बहन और भाई दुनिया में लाई। पुत्र जन्म के बाद परिवार में जश्न का माहौल था। नाते-रिश्तेदारों को मिठाइयां बांटी जा रही थी। हम भी खुश थे लेकिन समझ नहीं आ रहा था, आखिर ऐसा जश्न किसलिए! होश संभाला तो समझ आया बेटा-बेटी का भेद। फिर ठान लिया यह सोच बदलनी है। बेटी भी वो काम कर सकती है, जिसकी आस बेटे से लगाई जाती है...।