25 साल बाद इस तरह झुके बसपा-सपा, नए सियासी मोड़ पर उत्तर प्रदेश

25 साल बाद इस तरह झुके बसपा-सपा, नए सियासी मोड़ पर उत्तर प्रदेश

Laxmi Narayan Sharma | Publish: Mar, 14 2018 04:06:19 PM (IST) Lucknow, Uttar Pradesh, India

उत्तर प्रदेश में गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों पर उपचुनाव की गिनती के रुझानों ने सबको चौका दिया है।

लखनऊ. उत्तर प्रदेश में गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों पर उपचुनाव की गिनती के रुझानों ने सबको चौका दिया है। दोनों सीटों के मतगणना के रुझानों ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में 25 साल पुराने राजनीतिक इतिहास की झलक सामने रखी है। लोग साल 1993 के उस गठबंधन को याद कर रहे हैं जब सपा और बसपा के गठबंधन ने राम मंदिर की लहर पर सवार भाजपा को हवा में उड़ा दिया था। चुनावी रुझानों में उत्तर प्रदेश की दोनों सीटों पर जीत की ओर अग्रसर सपा के नेता राम गोविन्द चौधरी जब लखनऊ में बसपा सुप्रीमो मायावती से मिलने पहुंचे तो दोनों ने एक दूसरे का जिस तरह से अभिवादन किया, वह अंदाज अपने आप में राजनीति के परिवर्तन की नई दिशा की ओर संकेत किया है।

गठबंधन कायम रहने के संकेत

दोनों सीटों पर चल रहे मतगणना में वोटों की बढ़त से उत्साहित समाजवादी पार्टी के नेता राम गोविन्द चौधरी बसपा सुप्रीमो मायावती से मिलने पहुंचे। उन्होंने झुककर, हाथ जोड़कर मायावती को नमस्कार किया और धन्यवाद दिया। जवाब में मायावती ने भी हाथ जोड़कर राम गोविन्द चौधरी का अभिवादन स्वीकार किया। यह दृश्य राजनीति के विश्लेषकों के लिए एक नई तरह का संकेत पेश करता है। पूर्व में समाजवादी पार्टी अक्सर बसपा से गठबंधन का संकेत करते रहे हैं लेकिन बसपा हमेशा किसी बहाने से इंकार कर देती रही है। सपा नेता से मायावती की मुलाकात के दौरान की यह तस्वीर मायावती के बदले रुख को तो दर्शाती ही है, यह भी दर्शाती है कि मायावती के राजनीतिक वजूद को झुककर स्वीकार किये बिना आगे का गठबंधन का सफर संभव नहीं है।

कांग्रेस पर बढ़ेगा गठबंधन का दवाब

फिलहाल जो रुझान है, यदि वे नतीजों में बदलते हैं तो उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के गठबंधन के उम्र को लंबा माना जाना चाहिए। सिर्फ इतना ही नहीं, अब कांग्रेस की भी मजबूरी होगी कि वह इन दोनों दलों से गठबंधन में इनकी शर्तों को माने। कांग्रेस के सामने अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिए यह चुनौती होगी क्योकि दोनों ही सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारने वाली कांग्रेस की जिस तरह फजीहत हुई है, उससे उसके सामने सहयोगी दलों की शर्तों को झुककर स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प बचा नहीं है।

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