मुलायम के रुख पर निर्भर करेगा शिवपाल का भविष्य

मुलायम के रुख पर निर्भर करेगा शिवपाल का भविष्य

Hariom Dwivedi | Publish: Sep, 11 2018 06:19:44 PM (IST) | Updated: Sep, 11 2018 06:24:41 PM (IST) Lucknow, Uttar Pradesh, India

समाजवादी सेकुलर मोर्चा के अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव अपने भतीजे और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को पानी पी-पीकर कोस रहे हैं

महेंद्र प्रताप सिंह
त्वरित विश्लेषण
समाजवादी सेकुलर मोर्चा के अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव अपने भतीजे और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को पानी पी-पीकर कोस रहे हैं। वह रावण और कंस का उदाहरण देकर अहंकार के नाश की बात कर रहे हैं। उधर, अखिलेश चुप हैं। कुल मिलाकर एक माह के भीतर ही चाचा और भतीजे की लड़ाई दिलचस्प मुकाम पर पंहुच चुकी है। यूं तो विधानसभा चुनावों के पहले से ही दोनों के रिश्ते में खटास आ गयी थी। लेकिन, सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव की पहल से रार किसी तरह थमी। हालांकि, पारिवारिक लड़ाई की वजह से सपा को काफी नुकसान उठाना पड़ा और सत्तारूढ़ पार्टी 47 विधायकों पर सिमट गयी। इधर, अब जबकि लोकसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है तबसपा विभाजन के कगार पर खड़ी है।

राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि पार्टी के खिलाफ शिवपाल सिंह यादव की बगावत यूं ही नहीं है। इसके पीछे बड़ी राजनीतिक शक्तियां काम कर रही हैं। विधानसभा चुनावों के बाद राज्य में तेजी से बदली राजनीतिक परिस्थितियों में भाजपा का दंभ टूटा। लोकसभा के उपचुनावों में तीन महत्वपूर्ण सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार चुनाव हार गए। वजह तब खंडित विपक्ष नहीं था। मायावती और अखिलेश यादव की सारी ताकत एकजुट हो गयी थी। भाजपा को इससे बड़ा झटका लगा। वह चौकन्नी हुई। क्योंकि, तीनों सीटें कोई मामूली सीटें नहीं थीं। एक तरह से यह राज्य के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की पराजय थी। क्योंकि, यह सीटें इन्हीं की थीं। कैराना में भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति की पराजय हुई। राजनीति के धुरंधरों का मानना है कि इसके बाद से ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में अहम किरदार निभाने वाले अखिलेश यादव और मायावती की कमजोरियों की तलाश तेज हो गयी। 2017 के विधानसभा चुनावों की कमियों और खूबियों को फिर से खंगाला गया। हार-जीत का विश्लेषण हुआ। तब यह पता चला कि समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष के परिवार में हुई फूट का बड़ा फायदा भाजपा को हुआ था। शिवपाल यादव की नाराजगी और उनके साथी-संगियों ने समाजवादी पार्टी के खिलाफ माहौल बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। इसी फार्मूले को लोकसभा चुनाव में एक बार फिर दोहराने के लिए शिवपाल यादव को मोहरा बनाया गया। इस काम में सपा से निष्काषित अमर सिंह ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई। भाजपा यह जानती है कि उप्र की समकालीन राजनीति में यदि मायावती और अखिलेश यादव की एकजुटता को न तोड़ा गया तो पार्टी के लिए बहुत मुश्किल होगी। इसीलिए इस एकता से संभावित नुकसान को कम करने की कोशिशें जारी हैं। यही वजह है कि माया-अखिलेश के गठबंधन को कमज़ोर करने के लिए भाजपा जहां एक तरफ दलित और पिछड़ा वर्ग केन्द्रित राजनीति कर रही है वहीं वह राजनीतिक दुश्मनों के दुश्मनों को साधने में जुटी है।

भाजपा के मोहरा बने शिवपाल!
राजनीति के जानकारों का मानना है कि शिवपाल यादव का समाजवादी सेकुलर मोर्चा भाजपा की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव को उनके घर में ही एक बार फिर कमज़ोर करके घेर देने की योजना है। अखिलेश यादव की शिवपाल यादव के संबंध में यह टिप्पणी कि चुनाव करीब आने पर इस तरह की मिसाइलें दागी जायेंगी। इस ओर इशारा करता है कि शिवपाल भाजपा के मोहरा बन गए हैं। शिवपाल के साथ इलाहाबाद के बाहुबली नेता अतीक अहमद ने साथ आने की पेशकश कर दी है। मंगलवार को श्रीकृष्ण वाहिनी के साथ जिस तरह से अखिलेश के विरोधी एक मंच पर जुटे वह यह साबित करता है कि नाराज सपाइयों के लिए शिवपाल का दरबार कोपभवन का काम कर रहा है। कोपभवन में बाहुबलियों की जमात जिस तरह दस्तक दे रही है वह इस ओर संकेत कर रही है कि जिन्हें सपा से टिकट नहीं मिलने वाला वे शिवपाल के खेमे में शामिल होकर सपा-बसपा के लिए वोटकटवा साबित होने वाले हैं।

अखिलेश शिवपाल को तो नाराज कर सकते हैं, मायावती को नहीं
उधर, अखिलेश की मजबूरी यह है कि वे शिवपाल को तो नाराज कर सकते हैं लेकिन मायावती को नहीं। क्योंकि मायावती अब भी गेस्ट हाउस कांड के लिए शिवपाल यादव को ही दोषी मानती हैं। बहरहाल, शिवपाल यादव का अब अपने भतीजे अखिलेश से खुलकर राजनीतिक वैमनस्य शुरू हो चुका है। इस राजनीतिक वैमनस्य में अखिलेश के पिता और सपा के संरक्षक मुलायम सिंह की भूमिका अभी स्पष्ट नहीं है। हालांकि, अभी तक वे अखिलेश के ही साथ हैं। शिवपाल भले ही कुछ रुष्टों को अपने साथ जोड़ लें लेकिन, सपा का भविष्य मुलायम के रुख पर निर्भर करेगा।

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