पार्टी लाइन से अलग गोरखालैंड के समर्थन में उतरे Bhaichung Bhutia

Devesh Kr Sharma

Publish: Sep, 17 2017 02:48:28 (IST)

Miscellenous India
पार्टी लाइन से अलग गोरखालैंड के समर्थन में उतरे Bhaichung Bhutia

अपनी पार्टी से अलग स्टैंड लेते हुए बाइचुंग भूटिया ने कहा कि दार्जिलिंग पहाड़ की समस्या के स्थायी समाधान के लिए अलग गोरखालैंड राज्य जरूरी है।

सिलीगुड़ी. भारतीय फुटबॉल टीम के पूर्व कप्तान और तृणमूल कांग्रेस के नेता बाइचुंग भूटिया भी अब गोरखालैंड के समर्थन में उतर आए हैं। अपनी पार्टी से अलग स्टैंड लेते हुए बाइचुंग भूटिया ने कहा कि दार्जिलिंग पहाड़ की समस्या के स्थायी समाधान के लिए अलग गोरखालैंड राज्य जरूरी है। एक सिक्किम के एक अखबार से बातचीत में उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार को बड़े भाई का दिल दिखाते हुए छोटे भाई सिक्किम का ख्याल रखना चाहिए। तभी इस स्थायी समस्या का स्थायी और उचित समाधान निक ल सकता है। भूटिया ने कहा कि दार्जिलिंग पहाड़ कभी पश्चिम बंगाल का हिस्सा नहीं था, इसलिए बंगाल के लोगों को यह महसूस नहीं करना चाहिए कि उनका राज्य बंट रहा है।

 

भूटिया ने गोरखालैंड के मसले पर सीएम ममता बनर्जी के नजरिए से असहमति जताई हैं। हालांकि उन्होंने तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफा देने की बात से इनकार करते हुए कहा कि इससे कोई लाभ होने वाला नहीं है। पूर्व खिलाड़ी ने गोरखालैंड पर अपने विचारों को व्यक्तिगत बताते हुए कहा कि पहाड़ के लोग तीन दशक से भी अधिक समय से अलग राज्य के लिए संघर्षरत है। उन्होंने कहा कि सिक्किम के मुख्यमंत्री पवन चामलिंग को पहाड़ के नेताओं को समझाना चाहिए, जिससे वे गोरखालैंड की मांग को रचनात्मक और असरदार ढंग से रख सकें। सिक्किम के दो सांसदों को भी गोरखालैंड का विषय संसद में मजबूती से उठना चाहिए। भूटिया ने सुझाव दिया है कि गोरखालैंड समर्थक पार्टियों को बंगाली बुद्धजीवी वर्ग और तृणमूल नेताओं का समर्थन हासिल करना चाहिए। कुछ तृणमूल नेता और नौकरशाह गोरखालैंड की मांग से सहमत हैं, लेकिन इस बात को कहने या खुलकर समर्थन देने में मुश्किल महसूस करते हैं, अगर पहाड़ अलग राज्य या संघ शासित क्षेत्र बनता है, तो निश्चित रूप से इससे सिलीगुड़ी को भी लाभ होगा।

 

बता दें कि अलग गौरखालैंड राज्य की मांग को लेकर लगातार चल रहे आंदोलन से दोनों राज्यों के काफी लोग प्रभावित हो रहे हैं। पश्चिम बंगाल और सिक्किम में अभी तक करोड़ों रुपए का व्यापारिक और राजकीय नुकसान भी हुआ है। जबकि दार्जिलिंग-पहाड़ क्षेत्र के लोग अनिश्चितकालीन बंद और अघोषित कफ्र्यू के साये में जीवन गुजर बसर कर रहे हैं। पहाड़ क्षेत्र में रह रहकर हिंसा का दौर बार-बार शुरू हो जाता है। दोनों आंदोलनकारी गुट भी आपस में टकराते रहे हैं।

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