ओलंपिक की बड़ी तैयारी, दस साल के बच्चों को चुनेगी सरकार

Mukesh Kumar Kejariwal | Publish: Sep, 10 2018 09:45:34 AM (IST) | Updated: Sep, 10 2018 04:31:40 PM (IST) इंडिया की अन्‍य खबरें

खुद ओलंपिक चैंपियन रहे केंद्रीय खेल मंत्री कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ बता रहे हैं कि कैसे भारत को खेल महाशक्ति बनाने की तैयारी चल रही है। साथ ही उन्होंन मीडिया-सरकार के सभी विवादों पर सफाई भी दी ।

नई दिल्ली। केंद्रीय खेल मंत्री कर्नल राज्यवर्धन राठौड़ ने पत्रिका समूह के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत की। राज्यवर्धन राठौड़ ने खेल, खिलाड़ी और देश की प्रतिभाओं पर खुलकर अपनी बात रखी। वहीं उन्होंने बेबाकी से सभी सवालों के जवाब भी दिए।

प्रश्न- एशियाड में पहली बार 69 मेडल मिले, खेल मंत्री के तौर पर कितने संतुष्ट हुए और कितना सफर बाकी है?

राठौड़- दूसरे देश में इतने मेडल मिलना ज्यादा अहम है। मेजबान देश को कुछ खेलों को मुकाबले में शामिल करने की छूट होती है, इसलिए देशों को अक्सर सबसे ज्यादा पदक अपनी मेजबानी में आते हैं। इस बार एक और नई बात दिखी। 15-16 साल के खिलाड़ी, वे भी अधिकांशः गांवों की पृष्ठभूमि के, सीधे ऐसे मुकाबलों में जा कर स्वर्ण पदक जीत रहे हैं। अब उन्हें धुरंधर खिलाड़ियों का, बड़े मैदान का और ऐसे वातावरण का डर नहीं लगता। उन्हें ऐसे मुकाबलों में जाने से पहले ही वैसा पूरा वातावरण हम यहां उपलब्ध करवा रहे हैं। तीसरी बात, आप देखेंगे कि अब तक हमारे खिलाड़ियों का व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन प्रैक्टिस के दौरान होता था। अब ऐसा नहीं।

प्रश्न-एक ओलंपिक पदक विजेता खेल मंत्री है तो अब देश ओलंपिक से क्या उम्मीद रखे?

राठौड़-पहली बार किसी पीएम ने ओलंपिक के लिए टास्क फोर्स बनाने को कहा। इसमें सिविल सेवा के अधिकरी नहीं, खेल जगत के विशेषज्ञ लिए गए। तीन महीने की तैयारी के बाद एक दृष्टिपत्र दिया है। उस पर काम कर रहे हैं। अब निचले स्तर से ही, युवाओं को तैयार किया जा रहा है। खेलो इंडिया के तहत 16-17 साल के खिलाड़ियों को चुन रहे हैं। ये 2024 तक के लिए हैं। दूसरी बहुत जबर्दस्त योजना शुरू करने वाले हैं जिसमें 10-12 साल के बच्चों का चयन करेंगे। हर साल दिसंबर में उन्हें शामिल किया जाएगा।जिन खिलाड़ियों में पदक की उम्मीद है, उनके लिए हर तरह के विशेषज्ञ उपलब्ध करवा दिए हैं। ये उनके प्रशिक्षण और देख-भाल के साथ प्रतिद्वंद्वी के प्रदर्शन पर भी नजर रख रहे हैं।

प्रश्न- भारत दूसरी सबसे बड़ी आबादी है, छठी बड़ी अर्थव्यवस्था है। खेल में हम महाशक्ति कब बनेंगे?

राठौड़- यह तब तक नहीं हो सकता, जब तक हमारे यहां यह कहावत चलेगी कि ‘खेलोगे-कूदोगे बनोगे खराब’। खेल के लिए सकारात्मक माहौल परिवार से शुरू होता है। कितने मोहल्लों में ऐसे खेल मुकाबले हो रहे हैं? परिवार में हमें पढ़ाई के साथ ही
खेल, कला, नृत्य, संगीत सभी का महत्व समझना होगा।

प्रश्न-लेकिन सरकार और आप क्या कर रहे हैं?
राठौड़-संविधान ने खेल-कूद की जिम्मेदारी राज्य को दी है। मैं जिम्मेदारी से हट नहीं रहा। लेकिन इसी तरह लोगों को अपनी राज्य सरकारों से भी जवाब मांगना शुरू करना चाहिए।हम सिर्फ राष्ट्रीय टीम की तैयारी नहीं कर रहे, खेलो इंडिया के तहत सभी स्कूलों को अवसर दिया है। प्रति वर्ष एक हजार खिलाड़ियों को चुनेंगे और इनको प्रति वर्ष पांच लाख रुपये आठ साल तक दिए जाएंगे। यह ऐसी उम्र होती है, जब कारपोरेट स्पांसरशिप नहीं मिलती। अभिभावक दरवाजे खटखटाते हैं कि अपने काबिल बच्चों के लिए। सहयोग नहीं मिलता तो मजबूर हो कर खिलाड़ियों को नौकरी करने को मजबूर होना पड़ता है। मगर अब जिन खिलाड़ियों के घर पर छत नहीं, उनको भी विदेशी कोच और विदेशी ट्रेनिंग दिया जा रहा है। 1600 रुपये प्रति दिन खुराक पर खर्च कर रहे हैं। 50 हजार महीना जेब खर्च दे रहे हैं।

प्रश्न-क्रिकेट के जुनून में बाकी खेल उपेक्षित नहीं हो रहे?
राठौड़- अच्छा है कि कोई जुनून तो है। लेकिन आप देखेंगे कि जो प्यार और सम्मान क्रिकेटर को मिलता रहा है, अब लोग वही हर खेल के लोगों को दे रहे हैं।

 

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प्रश्न-खेल फेडरेशन कब बदलेंगे? खिलाड़ी को गुलाम मानना कब बंद करेंगे?
राठौड़- इन्हें समझना होगा कि खेल किसी की व्यक्तिगत जमींदारी नहीं। खिलाड़ी के सीने पर तिरंगा लगा तो वह पूरे भारत के मान-सम्मान का प्रतीक हो गया। चयन में फेडरेशन की स्वायत्तता है लेकिन 'पारदर्शिता भी जरूरी है। इन्हें सभी जरूरतें
पूरी करनी होंगी। खिलाड़ियों की शिकायत निवारण की व्यवस्था करनी होगी।

प्रश्न- आप सूचना और प्रसारण मंत्री भी हैं। यहां इतने विवाद क्यों होते रहते हैं?
राठौड़- हमारे इस मंत्रालय की भूमिका तो पर्दे के पीछे है। हम क्यों विवाद में आएंगे? यह मंत्रालय और मीडिया दोनों साथ मिल कर काम करते हैं। अलग नहीं। सरकार की बात लोगों तक पहुंचे और देशवासियों की बात सरकार तक पहुंचे।

प्रश्न- दूरदर्शन और आकाशवाणी को चलाने वाले प्रसार भारती ने स्वायत्तता का प्रश्न उठाया...
राठौड़- सवाल है कि अगर आप स्वायत्त हैं तो राजस्व भी पैदा करें। संसद ने कहा है 2019 तक सरकार प्रसार भारती का खर्च देगी, तो उसके बाद की प्रसार भारती ने क्या तैयारी की? मेरा मानना है कठिन प्रश्न उठते रहने चाहिए। तभी समाधान
निकलेंगे। सूचना और प्रसारण मंत्री के तौर पर मैं मीडिया के काम में न्यूनतम दखलंदाजी करना चाहता हूं।

 

प्रश्न- मीडिया को काबू करने के कई प्रयास पिछले दिनों हुए, आप भी ऐसा कुछ सोच रहे हैं?
राठौड़- मीडिया को हमेशा स्वतंत्र रहना चाहिए। मीडिया के काम में सरकारी दखलंदाजी के मैं खिलाफ हूं। नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है तो मीडिया को क्यों नहीं? नियमन का काम मीडिया को स्वयं करना चाहिए। मीडिया का सेल्फ रेगुलेशन ही हमारे देश की ताकत है। प्रिंट, टीवी और विज्ञापन के लिए स्वनियमन की संस्थाएं मौजूद हैं। लेकिन वेब के अंदर अभी नहीं है। मेरी व्यक्तिगत राय है कि यह काम आप खुद करें।

प्रश्न- विपक्ष कहता है सरकार ने जनता का खजाना अपने प्रचार पर लुटा दिया।
राठौड़- यूपीए ने चार साल में 51 करोड़ वर्ग सेंटीमीटर प्रिंट विज्ञापन खरीदा। हमारी सरकार ने 46 करोड़ वर्ग सेंटीमीटर। आज विज्ञापन का रेट ज्यादा है। उनके विज्ञापन गूगल से निकाल कर देखिए। पांच-पांच चौखटे (चेहरे) होते थे, प्रधानमंत्री
तो प्रधानमंत्री.. कई मंत्री और जो मंत्री नहीं थे, वे भी। अब सिर्फ प्रधानमंत्री की तस्वीर और योजना का ब्योरा होता है कि लोग उसका लाभ कैसे लें। यह प्रचार नहीं, सूचना, संचार और शिक्षा (आइईसी) है। मीडिया में मसाला ज्यादा चल रहा है तो यह सरकारी योजनाओं को जनता तक पहुंचाने का प्रयास है।

प्रश्न- आप अगर यूपीए प्रमुख सोनिया गांधी की ओर इशारा कर रहे हैं तो आपके भी विज्ञापनों में पार्टी अध्यक्ष होते हैं। सरकारी चैनल पर संघ प्रमुख को तवज्जो मिल रही है।
राठौड़- ऐसा नहीं है। सरकारी विज्ञापन में अपवाद सिर्फ तब होते हैं, जब वे (पार्टी अध्यक्ष) किसी कार्यक्रम में सांसद के तौर पर मुख्य अतिथि होते हैं। जहां तक आरएसएस प्रमुख की बात है, यह बताइए कि उनका बोला हुआ खबर होता है या नहीं? सब छापें तो ठीक, लेकिन वही खबर दूरदर्शन दिखा दे तो आप सवाल खड़े करते हैं।

 

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प्रश्न- केंद्र में इतनी अहम जिम्मेवारियों के बाद अब लोग राजस्थान में आपको अगले नेतृत्व के तौर पर देख रहे हैं।
राठौड़- यह जबर्दस्ती का वहम है। मुझे जो जिम्मेदारी दी जाती है, पूरा करने की कोशिश करता हूं। जो देश, पार्टी, नेतृत्व और जनता मांगे, उसके लिए कोई कमी नहीं छोड़ता। ना खेल में कमी रखी, ना सेना में और ना ही यहां रख रहा हूं।

प्रश्न- लेकिन राजस्थान में तो भाजपा लगातार उप चुनावों में हार रही है।
राठौड़- राजस्थान में ऐतिहासिक काम हुआ है। पहले जिसका दबदबा होता था, वह गांव में सड़क बनवा लेता, स्कूल खुलवा लेता। वसुंधरा जी ने लोकतांत्रिक तरीके से हर पंचायत को यह अधिकार दे दिया कि 12वीं तक का स्कूल होगा, गौरव पथ होगा। वे दूरदृष्टा हैं। पहली बार सरकार साधनों को लोगों तक ले कर आ रही है।

प्रश्न- फिर लगातार चुनाव क्यों हार रहे हैं?
राठौड़- उतार-चढ़ाव होते रहते हैं। उप चुनाव मुख्य चुनाव का संकेतक नहीं होता। केंद्र में भाजपा आई तब दो राज्यों में सरकार थी, आज 19 राज्यों में हैं।

प्रश्न- मंत्री रहते आप राजस्थान और अपने संसदीय क्षेत्र जयपुर ग्रामीण के लिए कितना
काम कर पाए?
राठौड़- मैंने शुरू से सांसद आपके द्वार कार्यक्रम चलाया। 80 फीसदी पंचायतों में जा चुका हूं। और यह बात पूरे दावे से कह सकता हूं कि पूरे क्षेत्र में एक भी पंचायत नहीं, जहां सांसद का काम नहीं हुआ हो। गांवों के युवाओं के सपनों को साकार करने रोजगार मेले आयोजित किए। खेलों का बड़ा कार्यक्रम किया। मेरे सांसद बनने से छह साल पहले से सेना की भर्ती रुकी
थी। अब सेना के आंकड़े हैं कि सबसे ज्यादा भर्ती यहां से हो रही है। दिल्ली, जयपुर राजमार्ग पर 12 फ्लाईओवर अधूरे थे। सब पूरे हुए। छह नए बना रहे हैं ताकि स्थानीय गांवों को सुविधा हो। 12 फुटओवर ब्रिज बना रहे हैं। ताकि हादसे नहीं हों। मुझ पर तो आरोप लगते हैं कि खेल मंत्रालय से सबसे ज्यादा सहायता राजस्थान को दी जा रही है। 120 करोड़ रुपये दिए हैं।

इंटरव्यू पैनल- सुनीता गोधारा (एशियाई मैराथन चैंपियन), आरती सिंह (महिला कार्यकर्ता), आशीष बंसल (युवा)

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