आंदोलन में हरियाणा की भूमिका अहम, देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचा रहा किसानों की बात

Highlights.
- राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से जुड़े होने के कारण इस राज्य की भूमिका आंदोलन में अहम है
- राज्य की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है और 81 प्रतिशत जमीन कृषि योग्य है
- किसानों को डर है कि कॉरपोरेट घराने उनकी जमीनें हड़प लेंगे, मंडी कर्मचारियों को लग रहा कि मंडी बंद हो जाएगी

 

नई दिल्ली।

पिछले साल दिसंबर के पहले हफ्ते तक हरियाणा में किसान आंदोलन राज्य के कुछ हिस्सों तक ही सीमित था, मगी अब यह बीते दो हफ्ते में बड़े पैमाने पर किसान महापंचायतों के साथ केंद्रीय स्तर पर आ गया है। हम बताते हैं क्यों इतने बड़े स्तर पर लामबंदी के बाद किसान आंदोलन अब हरियाणा में पंजाब की तरह केंद्र में आ गया है।

हरियाणा में कैसे हुई लामबंदी
सभी जानते हैं कि हरियाणा कृषि प्रधान राज्य है। यहां की करीब 81 प्रतिशत भूमि कृषि योग्य है। अधिकारियों की मानें तो राज्य की दो-तिहाई आबादी कृषि पर ही निर्भर है। राज्य में ग्रामीण क्षेत्रों में 65 प्रतिशत लोग रहते हैं। नाबार्ड से जुड़े रहे एक पूर्व अधिकारी एसएस सांगवान के मुताबिक, राज्य में लगभग 45 प्रतिशत कर्मचारी 24.8 लाख कृषक और 15.28 लाख खेतिहर मजदूरों के तौर पर कृषि से जुड़ी गतिविधियों में शामिल हैं।

अर्थव्यवस्था का आधार है कृषि
सांगवान के मुताबिक, हरियाणा में खेती अर्थव्यवस्था का मूल आधार है। हालांकि, यह राज्य के कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित है। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर एक बड़ी आबादी की निर्भरता खेती पर है। इसको देखते हुए उनकी भावनाएं किसान आंदोलन से जुड़ी हैं। जब से तीन नए कृषि बिल पेश किए गए, तब से ही मंडियों में किसानों ओर आढ़तियों के मन में आशंकाएं थी। खासकर, पंजाब में किसान यूनियनों की ओर से चलाए गए अभियान के बाद हरियाणा के किसानों के मन में भी एक भावना उत्पन्न हुई कि कॉरपोरेट घराने आए तो उनकी भूमि हड़प लेंगे। वहीं, आढ़तियों को लगता है कि नए कानून मंडी व्यवस्था को खत्म कर सकते हैं। इन परिस्थितियों में 26 जनवरी को हुई टै्रक्टर परेड से पहले और बाद में होने वाले क्रियाकलापों को लेकर हलचल बढ़ गई है।

किसान आंदोलन में हरियाणा की भूमिका अहम क्यों?
दरअसल, यह बड़ा सवाल है कि किसान आंदोलन में हरियाणा की भूमिका इतनी अहम क्यों है? हरियाणा ऐसा राज्य है, जो राष्ट्रीय राजधानी को तीन ओर से छूता है। इस राज्य के लोगों के लिए दिल्ली की सीमाओं तक पहुंचना आसान है। दिल्ली में ट्रैक्टर रैली से विरोध प्रभावी रहा। यहां छोटी से छोटी घटना भी राष्ट्रीय मीडिया और सरकार का ध्यान आसानी से खींच लेती है। इसके अलावा, राज्य में किसानों के लिए दिल्ली की सीमाओं और पंजाब तथा अन्य अशांत राज्यों में रहने की तुलना में घूमना-फिरना आसान है। इन परिस्थितियों में हरियाणा के किसानों का समर्थन आंदोलन को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए और देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभा सकता है।

हरियाणा को लेकर किसान नेता क्या कहते हैं?
माना जा रहा है कि किसान नेता आंदोलन में हरियाणा की ओर से जो अभी भूमिका अदा की जा रही है, उससे संतुष्ट हैं। उन्हें लगता है कि राज्य के लोग आंदोलन में ऐसे ही शामिल होते रहे तो आंदोलन न सिर्फ मजबूत होता रहेगा बल्कि, आने वाले दिनों में इसका और विस्तार होगा। हरियाणा में भारतीय किसान यूनियन के नेता गुरनाम सिंह चादुनी के मुताबिक, हरियाणा के लोग देर से जगते है, लेकिन जब उठते हैं तो तुरंत बिस्तर से भी उठ खड़े होते हैं। मौजूदा वक्त में आंदोलन में हरियाणा की भूमिका पहले नंबर पर है और किसानों से इसे नंबर एक पर बनाए रखने का अनुरोध भी करूंगा।

Ashutosh Pathak
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