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नेपाल ने आखिर क्यों ठुकरा दिया भारत का माउंट एवरेस्ट को दोबारा मापने का प्रस्ताव?

- वैज्ञानिकों ने एवरेस्ट की ऊंचाई में अंतर आने की अशंका जताई है
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नई दिल्ली

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Navyavesh Navrahi

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Updated: 27 Dec 2017, 7:44 PM IST

mount everest

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नई दिल्ली। नेपाल ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई को फिर से मापने के भारत के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। भारत 2015 में आए भूकंप के बाद माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई को दोबरा मापना चाहता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि भूकंप के बाद इस चोटी की ऊंचाई में परिवर्तन आया है। हालांकि, नेपाल के सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक गणेश भट्ट ने कहा है कि ये काम नेपाल खुद करेगा। इसक लिए भारत और चीन की मदद ली जा सकती है।

इनकार के पीछे चीन का हाथ

नई दिल्ली में मौजूद सूत्रों के अनुसार- माऊंट एवरेस्ट को संयुक्त रूप से फिर से मापने के प्रस्ताव को नेपाल के इनकार करने के पीछे चीन का हाथ हो सकता है। चूंकि यह चोटी चीन-नेपाल बॉर्डर पर है। भारत के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के एक बयान में कहा गया है कि 2015 में नेपाल में आए भूकंप के बाद दुनिया की सबसे ऊंची इस चोटी की ऊंचाई को लेकर वैज्ञानिक संदेह जता रहे हैं। बता दें, अप्रैल 2015 में 7.8 की तीव्रता से भूकंप आया था, जिसने नेपाल में तबाही मचा दी थी। इसमें 8 हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे जबकि लाखों लोग बेघर हो गए थे।

सर्वे ऑफ इंडिया का था प्रस्ताव

भारत के महा सर्वेक्षक मेजर जनरल गिरिश कुमार के अनुसार- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के तहत आने वाली 250 साल पुरानी संस्था 'सर्वे ऑफ इंडिया ने माउंट एवरेस्ट को नेपाल के सर्वेक्षण विभाग के साथ 'भारत-नेपाल संयुक्त वैज्ञानिक अभ्यास के रूप में फिर से मापने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन नेपाल ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने कहा कि अब नेपाल की ओर से ये कहा गया है कि वे स्वयं माउंट एवरस्ट की ऊंचाई मापेंगे। इस काम में वे भारत या चीन किसी को भी शामिल नहीं कर रहे हैं।

यहां रखा था प्रस्ताव

कुमार ने बताया कि काठमांडो में बुलाई गई एक बैठक में भारत की ओर से भी एक प्रतिनिधि शामिल हुआ था। इस बैठक मं चीन सहित कुछ अन्य देशों सर्वेक्षक और वैज्ञानिक भी मौजूद थे। उधर, भट्ट ने फोन पर इस बात की पुष्टि की है कि भारत से ऐसा प्रस्ताव उन्हें मिला है। लेकिन हम इस काम को स्वयं ही कर रहे हैं। जब उन्हें पूछा गया कि क्या चीन की ओर से भी उन्हें एवरेस्ट की ऊंचाई मापने का प्रस्ताव मिला है, तो उन्होंने इसका जवाब ना में दिया। उन्होंने यह जरूर बताया कि चीन ने 1975 और 2005 में एवरेस्टकी ऊंचाई मापी थी जबकि भारतीय सर्वेक्षकों ने 1956 में यह काम किया था। भारत के महा सर्वेक्षक ने भी ब्रिटिश काल में एवरेस्ट की ऊंचाई मापी थी।

सबसे पहले भारत ने मापी थी ऊंचाई

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की वेबसाइट पर जिक्र है कि 'भारत पहला देश है, जिसने भारत के महा सर्वेक्षक सर जार्ज एवरेस्ट के नेतृत्व में 1855 में माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई घोषित की और इसे दुनिया की सबसे ऊंची चोटी बताया।

नेपाल में शुरू हुआ काम

भट्ट ने बताया कि नेपाल में इस परियोजना पर शुरूआती काम शुरू कर दिया गया है। इस संबंध में शुरुाआती डाटा भी एकत्र किया जा रहा है। भूकंप से काफी नुकसान हुआ था। इसलिए दूसरे देशों से लिया डाटा महत्वपूर्ण होगा। भट्ट ने बताया कि इस संबंध में भारत से लेवलिंग डाटा और चीन से ग्रेविटी (गुरूत्व) डाटा मुहैया करने का अनुरोध भी किया गया है। ये डाटा एवरेस्ट की ऊंचाई निर्धारित करने के लिए महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि इस काम के लिए हम चीनी क्षेत्र में नहीं जाएंगे। इस संबंध में 2019 में आंकड़े जमा करवाए जाएंगे।

मामूली अंतर का जीवन पर कोई असर नहीं

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बंगलुरू के विज्ञानिक कुशलराज का कहना है कि माउंट एवरेस्ट की ऊंचाई में मामूली अंतर का लोगों के जीवन पर कोई सीधा असर नहीं पड़ता है।