
भोपाल. भारत को विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश माना जाता है। यहां विभिन्न धर्म और जाति के लोग रहते हैं। राजनीतिक दल क्षेत्रवाद और जातिवाद को लेकर वोट बैंक की राजनीति करते हैं । ऐसे में वे जाति और धर्म के आधार पर ही टिकट वितरित किया जाता है, चाहे प्रत्याशी की छवि धूमिल ही क्यों न हो। राजनीतिक दलों का लक्ष्य सिर्फ सत्ता पाना रह गया है।
निकाय चुनाव में धर्म और सियासत का मेल
चुनावी मुद्दों से लेकर जनता को धर्म के नाम पर इमोशन्स करने की कोशिश करता है। इसी के चलते आज कल चुनावो में धर्म और सियासत का मेल होता हुआ दिखाई दे रहा है और सवाल उठ रहा है कि क्या फिर से धुव्रीकरण का खेल खेला जा रहा है। इस चुनाव में एक बात कॉमन है कि बीजेपी, कांग्रेस और AIMIM तीनों ही धर्म का सहारा ले रहे हैं। कोई अपना वजूद तलाश रहा है तो कोई अपनी जमीन मजबूत करने में जुटा है तो कोई अपनी विरासत को बचाने की कोशिश कर रहा है।
बीजेपी और कांग्रेस में घमासान
कांग्रेस की तो पीसीसी अध्यक्ष कमलनाथ महाकाल की शरण में पहुंचे। और वही महाकल की भस्माआरती में शामिल हुए। दर्शन और पूजा के बाद उज्जैन से कांग्रेस के महापौर प्रत्याशी महेश परमार के लिए प्रचार किया। इस दौरान बीजेपी की सरकार पर कमलनाथ जमकर बरसे। और वही बीजेपी भी एक कदम आगे चल रही है। उसने भी हनुमान चालीसा के पाठ की शुरुआत कर दी है। युवा मोर्चा ने बाइक रैली की शुरुआत के पहले सैंकड़ों कार्यकर्ताओं के साथ सामूहिक हनुमान चालीसा का पाठ किया।
2023 विधानसभा चुनाव कि तैयारी
अभी से 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले एमपी में धर्म और सियासत का मेल फिर शुरू हो गया है. ओवैसी जहां निकाय की बिसात पर माइनॉरिटी वोट बैंक को खोजने की कोशिश कर रहे हैं. तो बीजेपी हिंदुत्व के एजेंडे पर खुल कर आगे बढ़ रही है। जबकि कांग्रेस प्रो माइनॉरिटी की इमेज से पीछा छुड़ाना चाह रही है। इन सब को देखते हुए एक बार फिर ये सवाल खड़ा होने लगा है कि चुनाव जीतने के लिए क्या वाकई धर्म का सहारा लेना ही आखिरी और एक मात्र उपाय है। क्या धर्म के सहारे के बिना चुनाव नहीं जीता जा सकता है।
Published on:
29 Jun 2022 06:47 pm
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