पुणे में एथेनॉल से फर्राटा भर रहीं कारें, नागपुर में बसों पर ट्रायल, देश भर में खुलेंगे पंप

पर्यावरण अनुकूल जैव ईंधन: पेट्रोल-डीजल से 40 से 45 रुपए सस्ता
गन्ना, चावल, गेहूं, मक्का, ज्वार से बनेगा एथेनॉल
कम होगी कच्चे तेल की आयात निर्भरता

By: Chandra Prakash sain

Published: 07 Sep 2021, 07:41 PM IST

ओमसिंह राजपुरोहित/पुणे/मुंबई. डीजल और पेट्रोल के भाव में उछाल के बीच सड़कों पर वाहनों की बढ़ती संख्या आमोखास को साल रही है। सियासी बयानबाजी के बीच महंगे ईंधन के सस्ते विकल्प तलाशे जा रहे। इसी कड़ी में पुणे के तीन पेट्रोल पंपों पर एथेनॉल पंप लगाए गए हैं। इन पंपों पर वाहनों की फ्यूल टंकी 100 प्रतिशत एथेनॉल से फुल कराई जा सकती है। सीमित संख्या में कारें महानगर की सड़कों पर एथेनॉल से फर्राटा भर रही हैं। नागपुर में यात्री बसों में एथेनॉल का ट्रायल हो चुका है। तेल कंपनियां पूरे देश में 100 प्रतिशत एथेनॉल बिक्री की तैयारी में हैं। सब कुछ ठीक रहा तो अगले छह महीने में उन सभी जिलों में सस्ते जैव ईंधन की सुविधा मिल जाएगी, जहां एथेनॉल से चलने वाले वाहन हैं। देश में पेट्रोल 110 रुपए लीटर तो डीजल 97 रुपए लीटर मिल रहा। इसके मुकाबले पुणे में एथेनॉल की बिक्री 65 रुपए लीटर की दर से की जा रही। लीटर पीछे यह 35 से 45 रुपए सस्ता है। डीजल और पेट्रोल में उतार-चढ़ाव अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की चाल पर निर्भर करता है। एथेनॉल पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। यह देश में ही गन्ना, गेहूं, चावल, मक्का और ज्वार से तैयार होगा। इससे किसानों को फायदा होगा। चीनी मिलें बदहाली से उबर सकती हैं। सालाना आठ लाख करोड़ रुपए के कच्चे तेल की आयात निर्भरता कम होगी। सबसे अहम यह कि एथेनॉल पर्यावरण अनुकूल जैव ईंधन है। इससे पर्यावरण प्रदूषण कम होगा। दूसरी तरफ हवा को जहरीली बनाने में पेट्रोल-डीजल का बड़ा योगदान है। एथेनॉल की तमाम खूबियों के बावजूद सामने बड़ी चुनौती है। एथेनॉल से चलाने के लिए वाहनों में फ्लेक्स इंजन होना जरूरी है। हकीकत यह कि देश में ऐसे वाहन अभी नहीं बनाए जा रहे। सरकार के अनुरोध पर ऑटो उद्योग इस दिशा में काम कर रहा है।

कैसे बनता है एथेनॉल
एथेनॉल बायो-फ्यूल (जैव इंधन) है। यह अल्कोहल आधारित है। चीनी मिलें इसका उत्पादन ज्यादा करती हैं। सरकार ने अनाज से एथेनॉल बनाने की मंजूरी दी है। स्टार्च-शुगर के फर्मेंटेशन से यह तैयार होता है। कच्चा माल आसानी से उपलब्ध है। इसे बनाने की लागत कम है। कपास के डंठल, गेहूं के भूसे और बांस से भी एथेनॉल हासिल हो सकता है।

किसानों को फायदा
कृषि क्षेत्र के जानकार आरके मिश्रा ने बताया कि एथेनॉल का उत्पादन लक्ष्य के हिसाब से बढ़ा तो सबसे ज्यादा फायदा किसानों को होगा। गन्ने की खेती को प्रोत्साहन मिलेगा। गेहूं-मक्का की खेती का दायरा भी बढ़ेगा। कपास की लकड़ी अभी फेंकी या जलाई जाती है। उसकी भी कीमत मिलेगी। बांस की मांग बढ़ेगी, जिसका लाभ पूर्वोत्तर के लोगों को मिलेगा। कृषि क्षेत्र को कर रियायतें मिली हैं। इसे देखते हुए एथेनॉल के भाव में उछाल की उम्मीद नहीं है।

अभी 10 प्रतिशत मिलावट
देश के अधिकांश हिस्सों में अभी 10 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (इ-10) मिलता है। अगले चार साल यानी 2025 तक पेट्रोल में 20 प्रतिशत मिश्रण (इ-20) का लक्ष्य है। जानकारों का कहना है कि 100 प्रतिशत एथेनॉल (इ-100) चालित वाहनों की संख्या बढ़ी तो कृषि क्षेत्र की तस्वीर बदल सकती है। कच्चे तेल का आयात घटा तो लाखों करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा बचेगी।

ब्राजील पहले नंबर पर
दुनिया के कई देशों में जैव ईंधन का इस्तेमाल होता है। इस मामले में ब्राजील पहले नंबर पर है। स्पेन में एथेनॉल सबसे महंगा 140 रुपए लीटर जबकि थाइलैंड में सबसे सस्ता 51 रुपए लीटर है। अमरीका, फ्रांस और ब्राजील में इसका भाव 51.50 रुपए से 65 रुपए के बीच है।

Chandra Prakash sain
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