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नशे से रोकने पर परिजन हिंसा का शिकार, दवा-दुआ तक बेकार

मादक पदार्थ के चलते शराब हाशिए पर, नशा रोकने की तमाम कवायद फेल

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सख्ती बेअसर

औसतन हर तीसरे दिन मादक पदार्थ तस्करी का एक मामला पकड़ रही है पुलिस

नागौर. नशाखोरी का चलन तेजी से बढ़ रहा है। मादक पदार्थ की खेप के साथ तस्कर भले ही खूब पकड़े जा रहे हों पर इसका नशा लेने वाले युवाओं पर नियंत्रण नहीं रहा। पुलिस ने भी अपने अभियान के तहत सैकड़ों युवाओं को नशा लेते पकड़ा भी पर छोडऩे के बाद ये फिर उसी रास्ते पर चल रहे हैं। नागौर का युवा एमडी/स्मैक ही नहीं अफीम/डोडा समेत अन्य नशीले पदार्थ की गिरफ्त में है, आलम यह है कि इस बड़े नशे के चलते ये शराब से दूर होते जा रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार तकरीबन डेढ़ साल में ही करोड़ों का मादक पदार्थ पकड़ा गया, वहीं चार सौ से अधिक तस्कर पुलिस के हत्थे चढ़े। बावजूद इसके ना मादक पदार्थ की तस्करी रुकी ना ही नशा लेने वाले कम हुए। पुलिस ने ऐसे-ऐसे तस्करों को पकड़ा जो नशे की पुडिय़ा खुद नशेडिय़ों तक पहुंचाने का काम करते हैं।पिछले पांच साल में नशा करने वालों की तादात तीस फीसदी बढ़ गई है। नशे में एमडीएमए टॉप पर चल रहा है। इसका नशा करने वाले को रोजाना दो से ढाई हजार रुपए खर्च कर रहे हैं। यही नहीं स्मैक, अफीम, डोडा-पोस्त सरीखे अन्य नशे अब नशेडिय़ों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं। पुलिस की जांच में सामने आया कि नशे की यह लत चौदह-पंद्रह साल के किशोरों तक को लग गई है। पिछले दिनों छोटी-मोटी चोरियों में निरुद्ध बाल अपचारियों ने कबूला कि वो नशे की खुराक पूरी करने के लिए ऐसा करते हैं।

रोकने-टोकने पर मारपीट

ऐसा नहीं है कि अभिभावक इन्हें रोकते-टोकते नहीं हैं पर अब उनकी सुनवाई भी बंद हो गई। हाल ही में शहर की बाहेतियों की गली निवासी धनरूप लाहोटी ने पुलिस को शिकायत की कि उनका बेटा महेश (37) नशे में ना सिर्फ माता-पिता को बल्कि अपने बच्चों को भी आए दिन मारता है। यही हाल कुछ और नशेडिय़ों का भी है, मादक पदार्थ का नशा लेने वालों को रोकने वाला भाई हो या पिता, माता हो या पत्नी, आए दिन मारपीट का शिकार हो रहे हैं। ऐसी कई घटनाएं पुलिस तक पहुंचती भी हैं। सामाजिक बदनामी का डर तो अपने बेटे का भविष्य संवारने का सपना सैकड़ों माता-पिता की हर पल चिंता बन गई है।

सलाह-मशविरा ही नहीं दवा तक बेकार

शहर के एक बुजुर्ग का कहना था कि करीब दो साल से वो अपने बेटे का नशा छुड़ाने की कोशिश कर रहे हैं। पूजा-पाठ के बाद खूब समझाया, यहां तक कि डॉक्टरों के पास तक ले गए। दो-चार दिन हीं रुका, फिर नशे के दलदल में फंसता गया। जिला अस्पताल में डी-एडिक्शन सेंटर है, जहां मनोचिकित्सक काउंसलिंग कर दवा भी देते हैं पर यह असरकारक कम होती है। वो इसलिए भी कि नशेड़ी अपनी संगत छोड़ नहीं पाता और फिर उसी राह पर चल निकलता है। नशा छोडऩे की इच्छा शक्ति की कमी भी इसका बड़ा कारण है।

हर तीसरे दिन एक मामला

सूत्र बताते हैं कि पिछले ढाई साल में मादक पदार्थ की तस्करी के करीब तीन सौ मामले दर्ज हुए, गिरफ्तार तस्करों की संख्या पांच सौ से अधिक रही। यही नहीं करोड़ों के मादक पदार्थ पुलिस के कब्जे में आए। बताते हैं कि वर्ष 2021 तक नशा या तो कम था या कार्रवाई कम होती थी। इस पूरे साल महज 54 मामले दर्ज हुए, वर्ष 2020 में 36, वर्ष 2019 में 32, वर्ष 2018 और वर्ष 2017 में 31-31 मामले ही एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज हुए।

बड़े नुकसान से अनजान

पुलिस ही नहीं शिक्षाविद, चिकित्सक, सामाजिक प्रतिनिधियों से बातचीत में सामने आया कि नशा युवा के लिए ही नहीं उसके परिजन के लिए भी काफी नुकसान दायक है। अकेेले स्वास्थ्य की ही नहीं सामाजिक, आर्थिक और मानसिक स्थिति भी नशे से ही बिगड़ती है। नशे की खुराक पूरी करने के लिए युवा अपराध कर रहे हैं, ऐसे में इस बड़े नुकसान को समझने-समझाने की आवश्यकता है।

इनका कहना

मेडिसिन, काउंसलिंग और कम्पनी के जरिए ही नशे पर काबू पाया जा सकता है। दवा के साथ समझाइश और फिर नशा करने वालों की संगत से दूर रहने पर फोकस कर इससे मुक्ति पाई जा सकती है। व्यक्ति की इच्छा शक्ति मजबूत हो तो यह मुश्किल नहीं, वैसे डी-एडिक्शन सेंटर पर कोशिश तो करते हैं।-डॉ राकेश कुमावत, सीएमएचओ नागौर